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पूर्व जन्मों के कर्मों के संचित फल प्रारब्ध बन इस जन्म में कैसे फलीभूत होते हैं?


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3599 days 10 hrs 21 mins ago By Gulshan Piplani
 

होनी तो होकर रहे नहीं हाथ हमारे टाल | आत्मा बुद्धि करे भ्रष्ट तब गुरु ही करे संभाल || जीव के पूर्वजन्म के अच्छे बुरे कर्म जो की संचित रह गए होते हैं और वह कर्म प्रारब्ध बन परिपक्व अवस्था को प्राप्त होने के समय, जीवात्मा के साथ घुल-मिल जाते हैं| जिस प्रकार अग्नि लकड़ी में प्रवेश करती है, वैसे ही पके हुए संचित कर्मफल जीव में प्रवेशकर सुलगते रहते हैं और सरंचना होती है वासना की, इसे स्वभाव या फिर मनुष्य की प्रकृति भी कहा जाता है| जब अच्छे कर्म फलीभूत होने होते हैं तो अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति एव्म गरीब से गरीब व्यक्ति से भी आत्मा ऐसा कार्य संपन करवा देती है जिससे उसे अतिशय संसारिक सुखों की प्राप्ति हो जाती है| प्राय: हमें ऐसा भासित होता है की यह कार्य हमने अपनी बुद्धि से किया है और हमारे ज्ञान का दंभ हमारे अन्दर अहंकार का सृजन कर देता है और अपार संसारिक सुख होते हुए भी कर्मानुसार सुख:-दुःख प्राप्त होते रहते हैं| ज्योंही बुरे प्रारब्ध के फलीभूत होने का समय आता है, मनुष्य की बुद्धि पथ भ्रष्ट हो जाती है और प्रारब्ध को फलीभूत कर देती है| यहाँ हम इस बात को एक और ढंग से समझते हैं जिससे विषय को समझना आसान हो जायेगा| सामान्यता लोग इसी बात को नहीं समझ पाते की पूर्व जन्मों के कर्मफल इस जन्म में फलीभूत कैसे होते हैं| यहाँ एक दोहा जोकि मेरी ही पुस्तक ‘ गुरु-गीता ‘ से लिया गया है विषय को समझाने के तर्कसंगत होगा: रथी आत्मा, रथ शरीर, बुद्धि को सारथि मान| विषय चारा इन्द्रिय घोड़ों का, मन को लगा लगाम|| पीछे बेठी आत्मा रथी है और शरीर रथ है और बुद्धि रुपी सारथि उस रथ को चला रहा है| हमारी इन्दिरियां रथ पर जुड़े घोड़े हैं और मन रुपी लगाम का सहारा सारथि को है जिस से वोह रथ को चला रहा है| विषय इन्दिरियों का चारा हैं| यहाँ समझने वाली बात यह है की आत्मा रथी है अर्थात सारथि (बुद्धि) रथी (आत्मा) के अधीन है| जीवन में ज्योंही हमारे पूर्व जन्मों के प्रारब्धों के फलीभूत होने का समय आता है रथी अर्थात आत्मा बुद्धि को निर्देश दे कर पूर्व जन्मों के अच्छे-बुरे फलों को फलीभूत करवा देती है| बुद्धि अर्थात सारथि को अपने मालिक अर्थात रथी की बात का पालन करना पड़ता है| अपने जीवन में अगर हम नज़र डालें तो कई बार इस तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ हम अपने अन्तकरण से दो आवाजें सुनते हैं| जिसमें एक आवाज़ आत्मा की होती है और दूसरी बुद्धि की| इस जन्म के सारे कार्य बुद्धि ही करती है क्योंकि मन रुपी लगाम भी बुद्धि के ही हाथ में होती है अगर वोह नहीं चाहे तो मन बुद्धि के अधीन होने के कारणवश बुद्धि पर हावी नहीं हो सकता परन्तु पूर्वेजन्मों के कर्मानुसार फलों को फलीभूत कराने हेतु रथी ( आत्मा) मन को भी हथियार बना उसे विषयों में उलझाकर भी अर्थात नयी नयी चाहतें उत्पन कर पूर्वेजन्मों के प्रारब्ध को फलीभूत करवा लेती है| हम अपने जीवन के इतिहास पर ध्यान दें तो ज्ञात होता है की कई बार हमारे पास समुचित वक्क्त होते हुए भी हम कई कार्यों को लंबित छोड़ देते हैं अर्थात आलस्य के वशीभूत हो हम महत्वपूर्ण कार्यों को भी लंबित छोड़ देते हैं जिसको करने हेतु हम सक्षम भी होते हैं और उसी कारणवश हमें हार या घाटे का मुंह देखना पड़ता है| दरअसल प्रारब्ध को फलीभूत कराने हेतु आत्मा (रथी) मन को भटका कर भी पूर्वेजन्मों के कर्मफल प्रदान कर देती है| क्योंकि आत्मा इस शरीर रुपी रथ की मालिक है इस कारणवश लगाम सारथि के अधीन होते हुए भी अपने असली मालिक रथी के ही अधीन है| यहाँ समझने वाली बात यह है कि रथी अर्थात आत्मा सारथि अर्थात बुद्धि को निर्देश देकर उसे मन कि बात मानने को विवश कर देती है और पूर्वेजन्मों के कर्मफल फलीभूत हो जाते हैं| अगर हम होनी को टालना चाहें तो भी नहीं टाल सकते| संचित कर्मो के फलों को तो स्वयं भगवान् भी नहीं टालते परन्तु परमात्मा एवं गुरु उन फलों के ताप को कम अवश्य कर सकते हैं| ‘ गुलशन हरभगवान पिपलानी ‘

3599 days 19 hrs 45 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... शारिरिक रूप में फलीभूत होते हैं..... प्रारब्ध के कारण ही भौतिक देह की प्राप्ति होती है।

3600 days 5 hrs 28 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

जन्म के साथ जो हमारे जीवन की रूप रेखा हमें मिलती है उसे ही प्रारब्ध कहते हैं और उसी के अनुसार हमारा जीवन चलता है उसी के अनुसार हमें माता पिता घर परिवार धन सम्पत्ति मित्र सहोदर मिलते हैं | यूँ तो जीव में सभी संस्कार होते हैं पर जो रूप रेखा हमें मिलती है उसके अनुसार उन संस्कारों का उदय होता रहता है | और हम अपने जीवन के उन उदय हुए संस्कारों के अनुसार भोग भोग लेते हैं | पर कभी कभी ऐसा संयोग भी होता है की जो रूप रेखा के अनुसार हमारा जीवन चल रहा होता है ठीक उसके विपरीत कोई संस्कार प्रभु कृपा से उदय हो जाते हैं और हमारा जीवन बिल्कुल पलट जाता है | हो सकता है वो भी उसी रूप रेखा में लिखा हो पर देखने में ऐसा नहीं लगता | जो भी भोग हम इस जीवन में भोगते हैं वो सब हमारा प्रारब्ध ही है | ज्योतिष विज्ञान ऐसा ही मानता है | राधे राधे

3600 days 12 hrs 13 mins ago By Avichal Mishra
 

Purva janmon ke sanchit karmon ke hi anusar hamain; is janm main priwar; bandhu; bandhaw; bairi; mitra; sukh-sampati; man aur budhi(sthir aur Anstir) Milti hai...

 
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