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संसार गुणों का खेल है

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि ये संसार गुणों का खेल है, इसका क्या अर्थ है?

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3555 days 8 hrs 51 mins ago By Gulshan Piplani
 

..........दृष्टा समझे प्रकृति तीन गुणों, बिन नहीं कोई कर्ता व्याप्त|.......... ..........तीन गुणों से पर पा .मुझको, हो .दिव्य स्वभाव को .प्राप्त||.......... -हरिओम तत्सत -

3555 days 11 hrs 32 mins ago By Gulshan Piplani
 

दृष्टा समझे प्रकृति तीन गुणों, बिन नहीं कोई कर्ता व्याप्त| तीन गुणों से पर पा .मुझको, हो .दिव्य स्वभाव को .प्राप्त|| -हरिओम तत्सत -

3556 days 1 hrs 12 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... संसार प्रकृति के सत, रज और तम गुणों का खेल है।.... जब तक व्यक्ति में सतोगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी कामनायें उत्पन्न होती रहती हैं तब तक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के अधीन (माया के अधीन) ही रहकर बार-बार जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता रहता है।

3556 days 13 hrs 4 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

जब भी कही पर भी किसी कथन के पीछे क्या उद्देश्य है इसकी बात आती है तो जितने लोग होते है उतने विचार भी उत्पन्न होते है इसमें से मेरा विचार यह है की यह संसार जो इश्वर की बनाई हुई अनुपम रचना है इसमें उन्होंने हर प्राणी चाहे वह समजाति का हो या विशाम्जाती का , सम्योनी का हो अथवा विषम योनी का , समलिंगी हो या विषमलिंगी सभी के विचार और गुण प्रथक प्रथक होते है , उनमे कही कही एकरूपता तो दिखाई दे सकती है परन्तु सभी गुण और विचार एक हो ऐसा नहीं हो सकता देखा जाए तो सभी प्राणियों में अगर सामान रूप से है तो वह है स्वयं इश्वर लकिन यहाँ भी बात वही आ जाती है की कोई उनको ढूंढ पाता है और कोई नहीं और कोई तो उनके होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देता है , इन्ही सब भिन्न भिन्न गुणों के कारन ही संघर्ष,वाद विवाद का जन्म होता है , जीवन चलता है और समाप्त होता है , लकिन इन सभी क्रियाओ प्रतिक्रियाव के मूल में इश्वर हीे रहते है और ये खेल ऐसे ही चलता रहता है ---हरी ॐ तत्सत

 
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