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पंडित,ज्योतिषाचार्य और मनोवैज्ञानिकों के भविष्य कथन को कितना महत्व देना चाहिये?

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3734 days 20 hrs 46 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

पंडित और ज्योतिषाचार्य तो भविष्य कथन कर सकतेे है लकिन मनोवैज्ञानिक का भविष्य कथन से कोई लेना देना नहीं है मनोवैज्ञानिक का कार्य मनोविकारो का अध्ययन करना है तो मनोवैज्ञानिक तो इस शंका से मुक्त है और रही बात पंडित और ज्योतिषाचार्य की तो वे भविष्यकथन कुंडली में स्थित ग्रहों की स्थितियों के आधार पर करते हैं जो संभावित होती है परन्तु भगवान् ने कलयुग में कर्मो को सर्वोपरी माना है अतः कर्मो की भी अपनी महत्ता है और किया हुए कर्म भविष्य को भी बदलने की शक्ती रखते है ------------- हरी ॐ तत्सत

3735 days 17 hrs 27 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... भौतिक उन्नति चाहने वाले व्यक्ति को अवश्य महत्व देना चाहिये, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले को कभी महत्व नहीं देना चाहिये।

3735 days 20 hrs 32 mins ago By Bhakti Rathore
 

राधे राधे जितना जरुरी हो उतना जायदा नहीं जब जो होना सो तो होगा हे फेले से उस क ले चिंता उर बड़ा लो अपने जीवन मेंराधे राधे

3735 days 21 hrs 9 mins ago By Gulshan Piplani
 

पंडित,ज्योतिषाचार्य और मनोवैज्ञानिक अगर हजारों वर्ष से समाज का हिस्सा हैं तो बिना प्रमाणिकता के उनका अस्तित्व अर्थात वजूद टिक नहीं सकता| हर सत्य समाज के सामने होता है पर लोग अपनी अपनी स्थिति अनुसार और ज्ञानानुसार ही ग्रहण करते हैं| कुछ चीजें अनावृत नहीं होतीं और सब कुछ बताया नहीं जा सकता क्योंकि सामने वाला उसे ग्रहण करने की जब तक स्थिति में नहीं होता ग्रहण नहीं कर पाता| जैसे किसी पंडित ने कहा की तुम ५ मंगलवार हनुमान जी के मंदिर में २१रु का प्रसाद चढाओ तो तुम्हारी समस्या का निदान हो जायेगा| इसका क्या मतलब हुआ| इस पक्ष को अनावृत करके देखते हैं, जिससे तीनो का महत्त्व प्रतिपादित होगा| ज्योतिष अनुसार भक्त की समस्या का ५ सप्ताहों में समाधान हो जाना था| पंडित जी ने भक्त को ५ मंगलवार इंतज़ार करने को नहीं कहा| ५ मंगलवार प्रसाद चढाने को कहा| प्रसाद चढ़ाना अध्यात्म के अनुसार त्याग का प्रतिरूप है| मनोविज्ञान के अनुसार ध्यान को समस्या से समाधान की तरफ परिवर्तित कर देना| अर्थात आस्था और वोह भी प्रभु के प्रति यहाँ मैं गीता जी के अध्याय १८ का शलोक - १४ का एक दोहा जो गीता का हिंदी दोहनुवाद है (मेरी पुस्तक गीताजी-कविताजी से उद्धृत है)......... शरीर कर्म क्षेत्र पा, आत्मा इन्द्रियों से कर्म कराये| पंच .कर्म .कारन .परमात्म,करण .जान.न.पाए|| (करण का तात्पर्य ज्ञानेद्रियाँ हैं)

 
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