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आत्म हत्या को अपराध माना जाता है। फिर जीव समाधि क्या है?


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3750 days 16 hrs 24 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey... samadhi ka arth khud ke aatma ko bhagwan mein leen kar dena jo ke jeevan ka uddeshey hai... aatma hatya hai apne jeevan ka anth karna jo insaan apne pareshaniyo se darr kar karta hai aur vichalit aatma moksha nahi prapat kar pati.. jai shri radhey

3757 days 23 hrs 52 mins ago By Bhakti Rathore
 

ha ye apraadh he jeev samdhi yaani ki jeev ka jnam ka lekha jokha jub pura ho jaata he tum use jo mott aati he wahi samdhi he

3766 days 16 hrs 40 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Atma hatya Log is jeevan Ke Dukho se Haarkar karte hain Aur Samadhi Wo Stithi hai jise Jeev Apney ko Sweksha Se parmatma Ko Samarpit kar Deta Hai.Dono me Sharir Nast Avasya hota hai kintu Dono ke Bhaav Alag-alag hai.

3767 days 1 hrs 45 mins ago By Vipin Sharma
 

AATM HATYA ALAG BAAT HAI OR JEEV SAMADHI BILKUL ALAG IN DONO KO EK SAATH NAHI JODA JA SAKTA.

3767 days 2 hrs 58 mins ago By Gulshan Piplani
 

जीव को मनुष्य योनी परमेश्वर की प्राप्ति हेतु प्रदान हुई है क्योंकि उसमें परमात्मा के अंश होने के नाते वोह सब गुण विद्यमान हैं| उस परमेश्वर द्वारा प्रदान किये हुए शरीर को मिटाने का हक़ भी हमें नहीं है जैसे अपने बनाये हुए माकन को हम गिरा सकते हैं पर दूसरे किसी के मकान को पूछे बिना हमें हाथ भी लगाने का हक नहीं है इसलिए आत्महत्या अपराध है| परन्तु ब्रह्म में लीन हो कर समाधी में चले जाना एक तप है| ब्रह्मसूत्र पर लिखा एक दोहा अवलोकन करैं: सूत्र १-१-९ ------------------ --------------------- स्वाप्ययात्------------------------------------------------------ हो विलीन स्व: स्वयं में सत् संपन्न हो जाये|------------------------------------------------------------------- हीन विलीन हो लीन स्व: स्वपिति कहलाये||-------------------------------------------------------------------- दोहा अनुवादक: गुलशन हरभगवान पिपलानी

3767 days 3 hrs 58 mins ago By Vipin Sharma
 

jeevatma se parmatma ka milan hi samadhi h

3767 days 6 hrs 34 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं.....आत्मा न तो शस्त्र द्वारा काटा सकता है, न ही आग के द्वारा जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगोया जा सकता है और न ही वायु द्वारा सुखाया जा सकता है, आत्मा को न तो तोडा़ जा सकता है, न ही जलाया जा सकता है, न इसे घुलाया जा सकता है और न ही सुखाया जा सकता है, यह आत्मा शाश्वत, सर्वव्यापी, अविकारी, स्थिर और सदैव एक सा रहने वाला है।...... आध्यात्मिक स्तर पर आत्मा को अधोगति में ले जाना ही आत्म-हत्या कहलाती है।.... जीवात्मा का "सांख्य-योग" द्वारा परमात्मा में स्थित हो जाना समाधि अवस्था कहलाती है।

 
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