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आत्म - चिंतन

इच्छाओं की पूर्ति में अंतकरण का कौन सा तत्व कार्य को सम्पूर्णता प्रदान करता है? और कैसे ?अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करें

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3586 days 15 hrs 12 mins ago By Bhakti Rathore
 

apne man ke ander jhakna

3597 days 10 hrs 52 mins ago By Gulshan Piplani
 

मेरी पुस्तक 'आत्म चिंतन परमात्म' चिंतन से उधृत|........................... जागृत अवस्था में पाँचों इन्द्रियाँ अपने कार्य में सदा लगीं रहतीं हैं| विषयों में लगी रहने के कारण वह अपने सन्देश चित में प्रेषित करती रहती हैं| चित में मन का वास होता है| मन इच्छाओं का जन्म स्थल है| मन इच्छाओं को जन्म प्रदान करता है| मन बुद्धि से निर्णय लेने को कहता है| बुद्धि की स्वीकारिता प्राप्त हो जाने के पश्चात (ये कार्य लाभ का है या हानी का) मन उसे अहंकार को प्रेषित करती है| अहंकार मनुष्य का कर्ता है जब अहंकार विषय में अपनी स्वीकारिता प्रदान कर देता है तब वह इच्छा संकल्प बन जाती है, ध्यान रहे पूर्ती कभी भी मात्र इच्छा की नहीं होती, उसे संकल्प बनना पड़ता है और बुद्धि और अहंकार की स्वीकारिता प्राप्त हुए बिना कोई भी इच्छा संकल्प नहीं बन सकती| संकल्प बन जाने के पश्चात् जीवात्मा का फैंसला माँगा जाता है| ठीक उसी तरह जिस तरह बिल राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है, हस्ताक्षर के लिए और फिर बुद्धि के परामर्श के पश्चात अहंकार ( मैं अर्थात कर्ता भाव) द्वारा उस कार्य को विकल्प की प्राप्ति हेतु पुन: कामेन्द्रियों को निर्देश दिया जाता है और वह उसे विकल्प प्रदान करने में तत्पर हो जातीं हैं| गुलशन हरभगवान पिपलानी

3598 days 9 hrs 13 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे, अंतःकरण के चार भाग होते है - मन,बुद्धि,चित्त,अहंकार.जब इन्द्रियां(कर्म इन्द्रिय और ज्ञान इंद्रीय) मन के वशीभूत होकर विषयों में विचरण करती है तो उस वस्तु को देखकर मन में उसे पाने देखने चखने सूघने कि इच्छा होती है जैसे हमे प्यास लगी हो तो मन में ये विचार आया कि मुझे पानी पीना है फिर बुद्धि ने ये निर्णय लिया कि हाँ मुझे पानी पीना है चित्त में वह बात स्टोर हो गए और अहंकार ने जाकर वह कार्य किया अर्थात हमने पानी पिया.तो अन्तःकरण के ये चारों भाग मिलकर कार्य को सम्पूर्णता प्रदान करते है,यदि मन में विचार आया पर बुद्धि ने निर्णय न लिया या चित्त में स्टोर न हुआ और हो भी गया तो अहंकार ने दिए निर्देश को न किया तब तक कार्य कैसे होगा....

 
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