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भगवान श्री राम ने भी जिसकी पूजा की - शमी का वृक्ष

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शमी वृक्ष को खेजड़ी या सांगरी नाम से भी जाना जाता है. शमी वृक्ष, जिसका पूजन "आश्विन शुक्ल दशमी" (विजयदशमी) दशहरे के दिन किया जाता है, रावण दहन के बाद करके इसकी पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान किया जाता है. इस परंपरा में विजय उल्लास पर्व की कामना के साथ समृद्धि की कामना का रहस्य छुपा हुआ है. खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है. ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है.


घरों में समृद्धि के लिए तुलसी की भाँति इसकी नियमित सेवा की जाती है. आयुर्वेद के अनुसार यह पौधा कफ विकारों को दूर करते हुए मासिक धर्म संबंधी समस्याओं के अलावा प्रसव पीड़ा निवारण में भी महत्व रखता है. तंत्र शास्त्र में युद्ध अथवा मुकदमेबाजी के मामले में यह उपयोगी है. 

शमी का रामायण और महाभारत में बड़ा महत्व बताया गया है, विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है. मान्यता है कि यह भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था. 

आज भी कई स्थानों पर 'रावण दहन' के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते सुवर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है
.


महाभारत में महत्व 

शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है. अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवो ने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था. कुरुक्षेत्र में कौरवो के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी और उससे शक्ति और विजय प्राप्ति की कामना की थी. तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है -


शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी 
.

अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया .
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ॥
 

अर्थ - हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं. आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय है.जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की मैं भी करता हूँ. मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये.

 

"शमी" वृक्ष ही यज्ञ की समिधाओं के लिए उपयुक्त वृक्ष है. यह बबूल और कीकर जाति का ही वृक्ष है. शमी वृक्ष की फलियों को खाकर कई दिनों तक ऋषि-मुनि भूखे रह सकते थे. इसे खाने से उपवास क्षमता बढ़ती है. शरीर पर कोई अधिक प्रभाव भी नहीं पड़ता. चर्बी घट जाति है.

शमी के पौधे की भ्रान्ति : शमी के पौधे के बारे में तमाम भ्रांतियां मौजूद हैं और लोग आम तौर पर इस पौधे को लगाने से डरते-बचते हैं. ज्योतिष में इसका संबंध शनि से माना जाता है और शनि की कृपा पाने के लिए इस पौधे को लगाकर इसकी पूजा-उपसना की जाती है. 

पूजन-लाभ : इसका पौधा घर के मुख्य द्वार के बाईं ओर लगाना शुभ है. शमी वृक्ष के नीचे नियमित रूप से सरसों के तेल का दीपक जलाएं, इससे शनि का प्रकोप और पीड़ा कम होगी और आपका स्वास्थ्य बेहतर बना रहेगा. विजयादशमी के दिन शमी की विशेष पूजा-आराधना करने से व्यक्ति को कभी भी धन-धान्य का अभाव नहीं होता.


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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पूजित वृक्षों की महिमा
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