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भगवान शिव का वरदान है - पलाश का वृक्ष

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पलाश का वृक्ष वैसे तो सर्वत्र पाया जाता है, यह एक मध्यम आकार का वृक्ष है इसके तने की छाल मोटी और गांठदार होती है, नई-नई शाखाएं रोम युक्त होती है, पत्ते हरे हरे मोटे गोलनुमा तथा तीन तीन पत्तो के समूह में विभक्त रहते हैं. पलाश तीन प्रकार का होता है. एक तो "गहरे लाल नारंगी रंग के फूलों वाला", दूसरा "पीले रंग के फूलों वाला" और तीसरा "सफेद रंग के फूलों वाला", सफेद फूलों वाला पलाश अब दुर्लभ हो चला है और कहीं कहीं बड़ी मुश्किल से ही दिखाई पड़ते है. सफेद फूलों वाले पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है. पलाश को हिंदी में ढाक, टेसू छत्तीसगढ़ी में परसा तथा उड़िया में पोरासु कहा जाता है. 

पलाश के वृक्ष की कथा 


'ढाक के तीन पात' कहावत प्रसिद्ध है
. ये तीन पात शिव के तीन नेत्रों के प्रतीक हैं. जब कामदेव ने शिव पर फूलों का बाण चलाया था, उस समय कामदेव ढाक के वृक्ष पर ही बैठा हुआ था. जब शिव का तीसरा नेत्र खुला और कामदेव भस्म हुआ तो पलाश (ढाक) भी जलने लगा. 

तब पलाश ने भगवान शिव से विनय की - कि 'भगवान ! आपने हमें क्यों जलाया, हमारा क्या अपराध है? 

शिव को दया आयी और उन्होंने उस पर लगी लपटों को फूल होने का वरदान दे दिया कि -तुझ पर जो पत्ते आवेंगे, वे मेरे नेत्र जैसे ही होंगे
. तभी से ढाक के फूल अग्नि जैसे होते हैं.

त्वचा रोग विशेषज्ञ का कहना है कि टेसू के फूल त्वचा रोग में लाभकारी है. कहना है कि टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जा सकता है. इससे एलर्जी नहीं होती है जबकि केमिकल वाले रंग-गुलाल त्वचा के लिए हानिकारक है. इनसे शरीर पर जलन होती है.

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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पूजित वृक्षों की महिमा
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