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कुशल बुद्धि का प्रतीक - कुश एक सात्विक पौधा

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कुश घास प्रगति और सतर्कता की प्रतीक है. कुशलबुद्धि शब्द मूल रूप से 'कुश' से ही बना है, जिसका मतलब है शुद्ध, तेज और सतर्क मस्तिष्क. कुश सात्विक पौधा है. यह बुद्धिमत्ता को प्रदर्शित करता है. कुश का इस्तेमाल आसन बनाने के लिए किया जाता है. इस आसन को यज्ञ और हवन-पूजन आदि करते हुए बिछाया जाता है. विवाह वेदी बनाने में भी इसका इस्तेमाल होता है. "भाद्रमास की कुशग्रहिणी अमावस्या" पर कुशा का पूजन किया जाता है.

                                           पुराणों में कुश का महत्व 


श्रीमद्भगवद्गीता
(श्लोक 6.10) में कृष्ण कहते हैं कि ध्यान लगाने के लिए व्यक्ति को न तो बहुत ऊंचाई पर बैठना चाहिए और न बहुत नीचे
. कुश का आसन लगाकर, उस पर हिरन की खाल बिछाकर साफ जगह बैठना चाहिए. 

इसी तरह गरुड़ पुराण में पंचक मृत्यु के बारे में लिखा गया है, पंचक के दिनों में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद के संस्कारों को ढंग से पूरा न किया गया हो, तो उसके परिवार के पांच व्यक्तियों की मौत हो सकती है
. इसलिए दाह संस्कार से पहले कुश (जिसे विष्णु का बाल माना जाता है) से पांच आकृतियां तैयार की जाती हैं और मृत व्यक्ति के कंधों और घुटनों पर रख दी जाती हैं. 

गरुड़ पुराण में उन व्यक्तियों के अंतिम संस्कार के बारे में भी बताया गया है, जिनकी मृत्यु किसी प्राकृतिक आपदा की वजह से हो जाती है और जिनका शव नहीं मिल पाता. इस तरह के मामलों में मौत की खबर आने के बाद उस व्यक्ति के नाम से कुश का एक पुतला तैयार कर लिया जाता है और पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया जाता है. 


पितृ तर्पण में कुशा का प्रयोग 


दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है
. यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोंनों विष्णु के शरीर से निकले हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं.कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है.भगवान विष्णु का कुश में निवास होने के कारण घर में कुश को पवित्र स्थान पर रखा जाता है. कुश की जड़ों से तैयार मनके की माला का इस्तेमाल भी कई रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों में होता है. 

पितृपक्ष में पितर कुशा की नोक पर निवास करते हैं. इसी कारण तर्पण करते समय कुशा को अंगुलियों में धारण किया जाता है तथा जो भी हम तर्पण (जल-भोजन) करते हैं, वह इसी कुशा के द्वारा हमारे पितरों को प्राप्त होता है.

                                                                आयुर्वेद में कुश


आयुर्वेद की दृष्टि से भी कुश काफी उपयोगी है
. इसका इस्तेमाल रक्त से जुड़ी गड़बडियां ठीक करने में, दमा, पीलिया, पथरी और त्वचा संबंधी बीमारियों के इलाज में किया जाता है. छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में कुश का इस्तेमाल हर्बल मेडिसन के तौर पर पारंपरिक रूप से किए जाने का उल्लेख मिलता है. 

इसके अलावा कुश की जड़ों से बने शर्बत का इस्तेमाल भी कुछ लोग नियमित रूप से करते हैं
. स्त्रियों से संबंधित बीमारियों में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है. कुश के शर्बत को एक बार तैयार करने के बाद पूरे साल पीया जाता है.कुश घास में कुछ औषधीय गुण जरूर होते हैं, इसलिए इससे शरीर में स्फूर्ति आती है और विषैले तत्व बाहर हो जाते हैं. 
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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