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जिसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से हुई - आंवले का वृक्ष

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पुराणों में आंवले के वृक्ष को परम पवित्र तथा भगवान विष्णु को अत्यन्त प्रिय कहा गया है जिस घर में आंवले का पेड़ होता है उस में भूत ,प्रेत ,दैत्य व राक्षस का प्रवेश नहीं होता तथा उसकी छाया में किया गया दीप दान अनंत पुण्य फल प्रदान करने वाला होता है .आँवले के वृक्ष की पूजा "कार्तिक मास में आँवला नवमी "को की जाती है.

                                                         आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति

 

विष्णु पुराण के अनुसार एक बार भगवान विष्णु के थूकने के फलस्वरुप उनके मुख से चन्दमा का जैसा एक बिन्दू प्रकट होकर पृ्थ्वी पर गिरा. उसी बिन्दू से आमलक अर्थात आंवले के महान पेड की उत्पति हुई. यही कारण है कि विष्णु पूजा में इस फल का प्रयोग किया जाता है.     

 

श्रीविष्णु के श्री मुख से प्रकट होने वाले आंवले के वृ्क्ष को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इस फल के महत्व के विषय में कहा गया है, कि इस फल के स्मरणमात्र से गऊ दान करने के समान फल प्राप्त होता हे. यह फल भगवान विष्णु जी को अत्यधिक प्रिय है. इस फल को खाने से तीन गुणा शुभ फलों की प्राप्ति होती है. 

आंवले के द्वारा एक चंडाल की मुक्ति 


एक चंडाल शिकार कहलने के लिए वन में गया वहाँ अनेको मरगो और पक्षियों को मरकर जब वह भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित हो गया तब सामने ही उसे एक आंवले का वृक्ष दिखायी दिया. उसमे खूब मोटे-मोटे फल लगे थे. चंडाल साहस वृक्ष के ऊपर चढ गया और उसके उत्तम-उत्तम फल खाने लगा प्रारब्ध वश वह वृक्ष के शिखर से पृथ्वी पर गिर पड़ा और वेदना से व्यथित होकर इस लोक से चल बसा.

फिर सम्पूर्ण प्रेत, राक्षस, भूतगण और यमराज के सेवक बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ आये किन्तु उसे ले न जा सके, यधपि वे महान बलवान थे तथापि उस मृतक चंडाल कि ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकते थे. जब कोई उसे पकड़कर ले जा न सका. तब वे अपनी असमर्थता देख मुनियों के पास

जाकर बोले -
हे महर्षियो!  चंडाल तो बड़ा पापी था फिर क्या कारण है कि हमलोग और ये यमराज के सेवक उसकी ओर देख भी न सके. क्यों ओर किसके प्रभाव से वह सूर्य कि भांति दुष्प्रेक्ष्य हो गया है?और हमें उसकी ओर दृष्टिपात करना भी कठिन जान पडता.

 

मुनियों ने कहा - हे प्रेत गण ! इस चंडाल ने आँवले के पके हुए फल खाए थे, उसकी डाल टूट जाने से उसके समपर्क में ही इसकी मृत्यु हुई है. मृत्यु काल में इसके आस-पास बहुत से फल बिखरे पड़े थे इन्ही कारणों से आप इसकी ओर देख भी नहीं सके ऑर रविवार आदि निषिद्ध बेला में भी नहीं हुआ इसलिए यह दिव्य लोक को प्राप्त होगा.

 

आंवले का प्रयोग एवम महत्व 


आंवले के सेवन से आयु में वृद्धि ,उसका जल पीने से धर्म का संचय तथा उसके जल में स्नान करने से दरिद्रता दूर हो कर समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है.आंवले के दर्शन ,स्पर्श एवम उसके नाम के उच्चारण से ही श्री विष्णु प्रसन्न हो जाते है. एकादशी तिथि में भगवान् विष्णु को आंवला अर्पित करने पर सभी तीर्थों के स्नान का फल मिल जाता है .

एकादशी के दिन यदि एक ही आँवला मिल जाए तो उसके सामने गंगा गया कशी और पुष्कर आदि तीर्थ कोई विशेष महत्व नहीं रखते है.एकादशी को आंवले से स्नान करता है उसके सब पाप नष्ट हो जाते है 
जिस घर में आंवले का वृक्ष या उसका फल रहता है उसमे लक्ष्मी एवम विष्णु का वास होता है. आंवले के रस में स्नान करने पर दुष्ट एवम पाप ग्रहों का प्रभाव नहीं होता .


मृत्यु काल में जिसके मुख ,नाक कान या बालों में आंवले का फल रखा जाता है वह व्यक्ति विष्णु लोक को जाता है. सर के बाल नित्य आंवला मिश्रित जल से धोने पर कलियुग के दोषों का नाश होता है .कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आंवले के वृक्ष का पूजन व प्रदक्षिणा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है.


इन तिथियो में उपयोग वर्जित है -
 रविवार, सप्तमी को, सूर्य-चन्द्र ग्रहण , सक्रांति , शुक्रवार , षष्टी, प्रतिपदा, नवमी तिथि, एवम अमावस्या तिथि को आंवले का त्याग करना चाहिए.
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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पूजित वृक्षों की महिमा
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