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व्रज चौरासी कोस यात्रा - परिचय

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पुराणों में ब्रज भूमि की महिमा का वर्णन है जहाँ श्री राधा-कृष्ण नित्य विराजते हैं  इस भूमि के दर्शन करने वाले को कोटि-कोटि तीर्थो का फल प्राप्त होता है. वराह पुराण में ऐसा कहा गया है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं. इस भूमि का कण-कण राधा-कृष्ण की पावन लीलाओं का साक्षी है यही वजह है कि व्रज यात्रा के लिए भक्त जन खिंचे चले आते हैं. हज़ारों श्रद्धालु ब्रज के वनों में डेरा डाले रहते हैं.

ब्रज रज की आराधना करने से भगवान् श्री कृष्ण और श्री जी के चरणों में अनुराग की उत्पत्ति होती है साथ ही ब्रज मण्डल में स्थित श्रीकृष्ण लीला क्षेत्रों के दर्शन मात्र से मन को अभूतपूर्व सुख-शांति व आनन्द की प्राप्ति होती.


ब्रज चौरासी कोस में उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के अलावा हरियाणा के होडल तहसील और राजस्थान का कुछ क्षेत्रफल आता है ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा के अंदर गांव, सरोवर, वन, कदम्ब खण्डियां, अनेक पर्वत व यमुना घाट एवं कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा वर्ष भर चलती हैं किंतु दीपावली से होली तक मौसम की अनुकूलता के कारण प्रमुख रूप से चलती है

ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा को लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं यह भी कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चौरासी लाख योनियों के संकट हर लेती है, इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है

यह परिक्रमा वृंदावन में यमुना पूजन से शुरू होती है इसके अलावा "मथुरा के विश्राम घाट" से भी शुरू होती है यहाँ यात्रा बस या कार से भी की जा सकती है यात्रा प्रतिदिन प्रात:काल से प्रारम्भ होती हैं, सायं काल को समाप्त हो जाती हैं. परिक्रमा के दौरान तीर्थयात्री भजन, संकीर्तन करते और ब्रज के प्रमुख मंदिरों व दर्शनीय स्थलों के दर्शन करते हुए समूचे ब्रज की बडी ही श्रद्धा के साथ परिक्रमा करते हैं.

ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा लगभग 268कि.मी. अर्थात् 168मील की होती है, इसकी समयावधि 40 दिन की है. ब्रजभूमि की यह पौराणिक यात्रा हज़ारों साल पुरानी है, इसका उल्लेख वेद-पुराण व श्रुति ग्रंथसंहिता में भी है. कृष्ण की बाल क्रीड़ाओं से ही नहीं, सतयुग में भक्त ध्रुव ने भी यही आकर नारद जी से गुरु मन्त्र ले अखंड तपस्या की व ब्रज परिक्रमा की थी.


त्रेतायुग में प्रभु राम के लघु भ्राता शत्रुघ्न ने मधु पुत्र लवणासुर को मार कर ब्रज परिक्रमा की थी. 'गलीबारी' स्थित शत्रुघ्न मंदिर यात्रा मार्ग में अति महत्व का माना जाता है.द्वापर युग में उद्धव जी ने गोपियों के साथ ब्रज परिक्रमा की.

कलियुग में 15वीं शताब्दी में माध्व सम्प्रदाय के आचार्य मघवेंद्र पुरी महाराज की यात्रा का वर्णन है तो 16वीं शताब्दी में महाप्रभु वल्लभाचार्य, गोस्वामी विट्ठलनाथ, चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी,आदि ने ब्रज यात्रा की थी.


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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व्रज चौरासी कोस -परिचय
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