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ब्रह्मा जी का मोह और उसका नाश

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भगवान यमुना जी के पुलिन पर सारे ले आये. और कहने लगे – मेरे प्यारे मित्रों! यमुना जी का यह पुलिन अत्यंत रमणीयहै. देखो! यहाँ की बालू कितनी कोमल और स्वच्छ है, रंग-बिरंगे कमल खिले हुए है, सुन्दर-सुन्दर पक्षी कलरव कर रहे है,अब हम लोग यहाँ भोजन कर लेते है क्योकि दिन बहुत चढ़ आया है, और हम सब को भूख भी लग रही है. बछड़े पानी पीकरसमीप ही धीरे-धीरे हरी-हरी घास चरते रहेगे .

 

ग्वालबालो ने एक ही स्वर में कहा - ठीक है! उन्होंने बछडो को छोड दिया और अपने–अपने छीके खोलकर भगवान के साथ बड़े आनंद से भोजन करने लगे. सबके बीच में भगवान श्रीकृष्ण बैठ गये, उनके चारो ओर ग्वालबाल ने बहुत-सी मंडलाकार पंक्तियाँ बना ली, सब के मुहँ श्रीकृष्ण की ओर थे, कोई पुष्प, तो कोई पत्ते और कोई–कोई पल्लव, अंकुर, एवं पत्थरो के पात्र, बनाकर भोजन करने लगे. भगवान सबको अपने हाथो से खिला रहे थे और सब भगवान को अपने हाथों से खिला रहे थे. भगवान सारे सखाओ को खिलाते और उनके मुहँ का कौर निकलकर स्वयं खा लेते.

 

 

ब्रह्मा जी ये लीला देख रहे थे, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ की ये कैसा बह्म? जो इन ग्वालो की झूठन खा रहा है. इतने में ही श्रीदामा अपने भोजन के पात्र को छिपाने लगे वे खट्टी छाछ लाए थे और सोच रहे थे, कि सब इतनी अच्छी वस्तुए मेरे कन्हैया को खिला रहे है, मै ये खट्टी छाछ कैसे दूँ?

 

 

इतने में ही भगवान ने कहा- क्यों रे श्रीदामा! ऐसी कौन-सी अच्छी वस्तु लाया है जिसे हम सब से छुपाकर अकेले ही खाना चाहते हो.उन्होंने सोचा कन्हैया मानेगे नहीं इसलिए इतना सुनते ही श्रीदामा ने छाछ झट से मुहँ में भर ली, जैसे ही उन्होंने मुहँ में भरी, भगवान ने उनके गालो में गुलचा मारा तो सारी छाछ श्रीदामा जी के मुहँ से बाहर निकलकर उनके ही शरीर पर बहने लगी. भगवान ने अपनी जीभ से वह छाछ चाट ली. और बोले - क्यों श्रीदामा इतनी मीठी छाछ अकेले ही पीना चाहते थे. इस प्रकार वे सब भोजन करने लगे.

 

 

उस समय भगवान की छवि सबसे निराली थी उन्होंने मुरली को तो कमर की फेंट में आगे की ओर ख्नोस लिया था, सिंगी और बेंत बगल में दबा लिया थे, बाये हाथ में बड़ा ही मधुर घृतमिश्रित दही-भात का ग्रास था और बाये अगुंलियो में अदरक नीबू आदि का अचार था इस प्रकार लीला करते हुए भोजन कर रहे थे .

 

 

सब भोजन करते–करते तन्मय हो गये उसी समय उनके बछड़े हरी हरी घास के लालच से घोर जंगल में बड़ी दूर निकल गये जब सबका ध्यान उस ओर गया तो वे भयभीत हो गये उस समय भगवान ने कहा – मेरे प्यारे मित्रों !तुम लोग भोजन करना बंद मत करो .मै अभी बछडो को लिए आता हूँ ग्वालबालो को इस प्रकार कहकर भगवान हाथ में दही का कौर लिए पहाडो में ढूढने चल दिए.ब्रह्माजी पहले से आकाश में उपस्थित थे पहले तो बछडो को और भगवान श्रीकृष्ण के चले जाने पर ग्वालबालो को भी अन्यत्र ले जाकर रख दिया स्वयं अंतर्धान हो गये .

 

 

भगवान श्रीकृष्ण बछड़े ना मिलाने पर यमुना के पुलिन में वापस लौट आये परन्तु यहाँ क्या देखते है कि ग्वालबाल भी नहीं है तब उन्होंने वन में घूम-घूमकर चारो और बछड़े उन्हें कही नहीं मिले तो वे तुरंत जान गये कि यह सब करतूत ब्रह्मा जी कि है वे तो विश्व के एक मात्र ज्ञाता है. 

 

 

अब भगवान श्रीकृष्ण ने बछडो और ग्वालबालो की माताओ को तथा ब्रह्मा जी को भी आनंदित करने के लिए अपने–आपको ही बछडो और ग्वालबालो – दोनों के रूप में बना लिया*भगवान सर्वसमर्थ है वे ब्रह्मा जी के चुराए हुए ग्वालबाल और बछडो को ला सकते थे किन्तु इससे ब्रह्माजी का मोह दूर ना होता और वे भगवान की उस दिव्य माया का ऐश्वर्ये ना देख सकते जिसमे उनके विश्वकर्ता होने के अभिमान को नष्ट किया.इसलिए भगवान उन्ही ग्वालबालो और बछडो को ना लाकर स्वयं ही वैसे ही एवं उतने ही ग्वालबाल और बछड़े बन गये.

 

 

वे बालक और बछड़े संख्या में जितने थे जितने छोटे-छोटे उनके शरीर थे उनके हाथ-पैर जैसे-जैसे थे, उनके पास जितनी और जैसी छडिया, सिंगी, थी और जितने वस्त्राभूषण थे उनके शील, स्वभाव, गुण, नाम, रूप, और अवस्थाएँ, जैसी थी जिस प्रकार चलते-फिरते थे खाते-पीते थे उतने ही रूपों में भगवान प्रकट हो गये उस समय यह सम्पूर्ण जगत विष्णु रूप हो गया. यह वेदवाणी मानो मूर्तिमान हो गयी अपने ही आत्मस्वरूप बछडो को अपने ही आत्मस्वरूप ग्वालबालो के द्वारा घेरकर अपने ही साथ अनेको प्रकार के खेल-खेलते हुए उन्होंने व्रज में प्रवेश किया. जिस ग्वालबाल के जो बछड़े थे उन्हें उसी ग्वालबाल के रूप से अलग-अलग ले जाकर उसकी बाखल में घुस दिया और विभिन्न बालको के रूप में उनके भिन्न–भिन्न घरों में चले गये.

 

 

ग्वालबालो की माताये बाँसुरी की तान सुनते ही जल्दी से दौड पड़ी ग्वालबाल बने हुए परब्रह्म श्रीकृष्ण को अपने बच्चे समझकर हाथों से उठाकर उन्होंने जोर से हदय से लगा लिया प्रतिदिन संध्याकाल में भगवान उन ग्वालबाल के रूप में वन से लौट आते, माताएँ उन्हें उबटन लगाती, नहलाती, अच्छे–अच्छे वस्त्र पहनाती ग्वालिनो ने समान गौए भी जब जंगल से चरकर जल्दी-जल्दी लौटती और हुंकार सुनकर उनके प्यारे बछड़े दौडकर उनके पास आ जाते तब वे उन्हें अपनी जीभ से चाटती और उस समय स्नेह की अधिकता से उनके थानों से स्वयं ही दूध की धारा बहने लगती अपने असली पुत्रो की अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अवश्य अधिक था अपने-अपने बालको के प्रति ब्रजवासियो की स्नेहलता दिन-प्रतिदिन एक वर्ष तक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी. इस प्रकार भगवान एक वर्ष तक वन और गोष्ठी में क्रीडा करते रहे .

 

 

ब्रह्माजी ब्रह्मलोक से ब्रज में लौट आये उनके कालमान से अब तक केवल एक त्रुटि समय (जितने देर में तीखी सुई से कमल की पंखुड़ी छिदे)व्यतीत हुआ उन्होंने देखा भगवान श्रीकृष्ण ग्वालबालो और बछडो के साथ पहले की भाति ही क्रीडा कर रहे है उन्होंने दोनों जगह देखा.कि ये उतने ही ग्वालबाल कहाँ से आ गये अब उन्हें समझ में नहीं आया कि कौन असली है, कौन नकली है वे अपनी ही माया से मोहि हो गये वे विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-ही-देखते क्षणभर में ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्ण के रूप में दिखाई पड़ने लगे सब-के-सब श्यामवर्ण पीताम्बरधारी, सिर पर मुकुट, कानो में कुंडल, और कंठ में मनोहर हार, चरणों में नुपुर, कलाइयो में कंगन,धारण किये हुए है उनकी आँखे मुद गयी उन्हें कुछ भी ज्ञान ना रहा कुछ देर बाद जब उन्होंने धीरे-धीरे आँखे खोली तो उन्हें वृन्दावन के दर्शन हुए तब भगवान को देखते ही ब्रह्माजी अपने ही वाहन हंस पर से कूद गये और पृथ्वी पर दंड की भाति गिर गये उनके आँखों से आँसुओ की धार बहने लगी फिर भगवान की ४० श्लोको में स्तुति की.इसके बाद उन्होंने ग्वालबालो और बछडो को यथास्थान पहुँचा दिया और वे चले गये .और भगवान ग्वालबालो के साथ यमुना जी के पुलिन में आकर फिर वैसे ही हास-परिहास करने लगे .

 

सार-

 

जब भगवान को यशोदा जी के साथ गोपियाँ और गाये देखती थी तो उनके मन भी ये भाव आते थे कि भगवान हमारे पुत्र होते तो हम उन्हें लाड़ लड़ाते,वे हमारा भी दूध पीते उन सबकी मनोकामना पूरी करने के लिए ही भगवान ने एक वर्ष तक बछड़े और ग्वालबाल बनकर उनको पुत्र की भाति ही सुख पहुँचाते रहे.

 

जय जय श्री राधे  


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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