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अभागा वो है जिस पर संत कृपा नहीं

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विभीषण जी ने बहुत समझाया परन्तु रावण ने एक भी नहीं मानी,भगवान शिव पार्वती जी से कहते है- हे उमा संत की बडाई है कि वे बुराई करने पर भी बुराई करने वाले की भलाई ही करते है.विभीषण जी भी रावण से कहते है- आपने मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया परन्तु हे नाथ आपका भला श्री राम जी को भजने में ही है.


ऐसा कहकर विभीषण जी जैसे ही चले -

 

                                                "अस कहि चला बिभीषनु जबहीं ,आयूहीन भये सब तबहीं

                                                  साधू अवग्या तुरत भवानी ,कर कल्यान अखिल कै हानी"

अर्थात - ऐसा कहकर जैसे ही विभीषण चले त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए,उनकी मृत्यु निश्चित हो गई.साधू का अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याण की हानि कर देती है.


                                           "रावन जबहिं विभीषन त्यागा,भयउ विभव बिनु तबहिं अभागा

                                                चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं करत मनोरथ बहु मन माही"

अर्थात - रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा, वैभव से हीन हो गया. विभीषण जी हर्षित होकर मन में अनेको मनोरथ करते हुए श्री रघुनाथ जी के पास चले गए.

अभागा कौन है ?अभागा वो नहीं जो अभाव ग्रस्त है, अभागा वो है जिस पर संत की कृपा नहीं है वास्तव में वही अभागा है.इसलिए जब विभीषण गए,तो रावण का वैभव तो वैसा ही रहा परन्तु संत रूपी वैभव से हीन हो गया इसलिए तुलसीदास जी ने लिखा विभीषण के चले जाने पर रावण अभागा हो गया.
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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