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दस प्रकार के नामापराध

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महाप्रभु अपने भक्तो को नामपराध से बचे रहने का उपदेश करते थे.किसी भी भक्तको किसी की निंदा करते देखते, तो उसेसचेत करते वे कहते द्वेष भाव, निंदा महान पाप है वे कहते  भगवद्भभक्त को सदा सुन्दर अंगराग समझ कर शरीर में मलाकरो. इसलिए उनके  भक्त एक दूसरे को देखकर आपस में लिपट जाते,पैरों को ही पकड़ लेते,वे नामापराध चाहे कोई भीहो,प्रभु उसे दण्ड देते.

 

 

भगवन्ननाम में दस बड़े भारी अपराध है – 

 

. सत्पुरुर्षो की निन्दा 

 

. भगवन्नामो में भेद-भाव ..

 

३. गुरु का अपमान ..

 

. शास्त्र निंदा ..

 

. भगवन्नामो में अर्थवाद ..

 

६. नाम का आश्रय ग्रहण  करके पापकर्मो में प्रवृत होना ..

 

. धर्म व्रत जप आदि के साथ भगवन्नाम की तुलना करना ..

 

८. जो भगवन्नाम को सुनना न चाहता हो उन्हें नाम का उपदेश करना ..

 

९. नाम का श्रवण करके नाम में प्रेम ना होना ..

 

१०. अंहता-ममता तथा विषय भोगो में लगे रहना ..

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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छै गोस्वामी जी
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