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राधामाधव प्रेम में गोपी स्व आनंद भी नहीं चाहती

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"ब्रह्मानंद" अर्थात “ब्रह्म के मिलने में जो आनंद है” उसकी अपेक्षा “भगवत सेवानंद” श्रेष्ठ है और सेवानंद से “प्रेमानंद” श्रेष्ठ है, वह इसलिए क्योकि ब्रह्मानंद एकरूप से है उसमे विलास या नवंनवयमानता नहीं है. जैसे प्रेमानंद है जिसमे कभी प्रेम है, कभी मान है, कभी रस है, अनुराग है, तो कभी नयी-नयी भावनाओ का उदय है. प्रेमी प्रीतम सदा नव नवयमान से रहते है जहाँ नित्य प्रेम बढता रहता है ये केवल प्रेमानंद में ही है.

 

बह्रमानंद मे क्या है? हम ध्यान करके शॅून्य को ही आराधते है. निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना करते है ,इस तरह ब्रह्मानंद किस काम का जो सगुण साकार भगवान ही न मिले, उनके प्रेम मे जो आनंद है  वो उस “ब्रह्मानन्द” में भी नहीं है. इसलिए "ब्रह्मानंद से श्रेष्ठ "भगवतसेवानंद" है, और “भगवतसेवानंद” में भी “श्रीकृष्ण सेवानंद” श्रेष्ठ है. और गोपीभाव में तो भक्त को सेवा में ही आनंद मिलता है. पर गोपी "सेवाआनंद" से मिलने वाले आनंद को भी नहीं चाहती" वे तो अहेतु की सेवा चाहती है. क्योंकि सेवाआनंद में सेवक के मन में आनंद का अनुसन्धान, आवेश और पिपास रह जाती है. कि मुझे सेवा में आनंद मिले. इसे हम निकुंज की एक लीला से समझ सकते है.

एक बार निकुंज में राधा माधव बैठे थे. गोपी पंखा झिला रही है. पंखे की हवा से राधा माधव जी को सुख मिला और वो गोपी की सेवा से प्रसन्न हुए और मंद-मंद मुस्कुराते हुए गोपी की ओर देखने लगे,  तो इससे गोपी में आनंद के कारण अंदर सात्विक भाव का उदय हो गया. प्रेम में “सात्विक भाव” होते है. जैसे कंपन, स्तब्ध, आदि. तो उसे स्तब्धता और इसके साथ जडता का भाव उदय हुआ जिससे वह जैसे खड़ी थी वैसे ही खड़ी रह गई और हाथ में जडता आने से पंखा झुलाना रुक गया. 


कुछ देर बाद जब भाव से बाहर आई तो गोपी ने आनंद केा धिक्कारा कि ऐसा आनंद किस काम जो सेवा में बाधा डाले तो ये प्रेम की पराकाष्ठा है .गोपी को सेवा में ही आनंद है परन्तु वह ऐसा आनंद नहीं चाहती जिससे उसकी सेवा में बाधा आये, गोपी ब्रहमानंद, भगवतसेवानंद भी नहीं चाहती. गेापी को अपना सुख नहीं. राधा माधव का सुख चाहिए. गोपी का राधा जी के प्रति ऐसा दिव्य प्रेम है. यहाँ पर कोई जलन,डाह जैसी चीजों के लिए तो जगह ही नहीं है. कि हम भवगान की प्रियसा है . और तुम कुछ नहीं ऐसा नहीं है . वहाँ तो सब  दूसरे के सुख के लिए ही है. 
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2017-04-24 11:51:58 By Ashwani bagga

मैं बी आप के साथ चलना चाहता हूं ।

2012-02-01 17:09:25 By neha bajaj

its too gud muje roj katha send kre pz

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