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वस्तु का गुण एवम भाव

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एक होता है, वस्तु का स्वाभाविक गुण । जैसे अग्नि का जलाना य्या दाहकता ।


फिर इसमें भाव को मिश्रित करके दीपक बना कर प्रभु की आरती करना । प्रभु की आरती करना भाव प्रधान है । भाव होने से ही फल प्राप्ति होगी ।


अन्यथा तो एक बार गंगा स्नान से अनेक पाप कट जाते हैं तो मछलियां तो पाप मुक्त ही समझो, जो गंगा में ही जीती मरती हैं ।


धाम का एक सफाई कर्मचारी जितना ब्रज रज का दिनभर सेवन करता है, उतना शायद ही कोई भक्त करता हो ।


अतः भाव आवश्यक । 'भावो हि विद्यते देवः'


यद्यपि नाम की प्रारंभिक अवस्था मे


भाव कुभाव अनख आलसहू कहा गया फिर भी संपूर्णता हेतु भाव का आश्रय लेना ही होगा


दासाभास का समस्त वैष्णवजन को प्रणाम

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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दासाभास डा. गिरिराज नागिया
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