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राधा रस

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एक समय श्री ठाकुरजी रास कर रहे थे. रास करते-करते श्री ठाकुरजी को इतना आनंद आया की श्री ठाकुरजी के ह्रदय सु आनंद की धारा प्रगटी और वो आनंद जल स्वरुप सु श्री मस्तक से श्रमजल बिंदु स्वरूप प्रकट हुए.

ये श्रमजल बिंदु बहते-बहते श्री ठाकुरजी के नेत्र के पास आये तब श्री ठाकुरजी के नेत्रों में लगे काजल का रंग इसमें मिला तब ये श्रमजल बिंदु श्याम हुए.


ये श्याम श्रमजल बिंदु बहते-बहते श्री ठाकुरजी के अधर के पास आया तब श्री ठाकुरजी ने श्री मुख में बीड़ापान आरोगे हुए थे.श्याम श्रमजल बिंदु श्री ठाकुरजी के अधर के पीग (उगार)में मिला तब ये श्याम श्रमजल बिंदु रक्तश्याम श्रमजल बिंदु हुए.


रक्तश्याम श्रमजल बिंदु श्री ठाकुरजी के पुरे श्री अंग से बहते बहते चरण के पास आया तब श्री ठाकुरजी की चरणरज इसमें मिली तब ये रक्तश्याम श्रमजल बिंदु चरणामृत हुआ.


इस प्रकार ये श्रमजल बिंदु बहते-बहते बाहर आया, ये ही हमारे कृपासिंधु श्री यमुना जी को आधिदैविक स्वरुप्.


श्रमजल बिंदु श्री ठाकुरजी के श्री अंग से प्रकट हुए, ये श्रमजल बिंदु नेत्र के काजल में मिला और श्याम हुआ तब श्याम श्रमजल बिंदु "नेत्रामृत" बना.


ये श्रमजल बिंदु श्री ठाकुरजी के अधर की पीग (उगार) में मिला और ये श्रमजल बिंदु रक्तश्याम हुआ तब रक्तश्याम श्रमजल बिंदु "अधरामृत" बना.


आगे ये रक्तश्याम श्रमजल बिंदु बहते बहते श्री ठाकुरजी के चरणरज मिला तब ये रक्तश्याम श्रमजल बिंदू "चरणामृत" बना.


इस प्रकार जिसमे श्री ठाकुरजी का नेत्रामृत, अधरामृत, और चरणामृत है. ऐसी श्री यमुने महारानी की सदा सर्वदा जय हो.

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2021-06-10 17:38:08 By Adarsh Negi

श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश

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राधा रस
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