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पुरषोत्तम मास में प्रतिदिन पाठ करे - श्रीचौर अग्रगण्य अष्टकम

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 "श्रीचौर अग्रगण्य अष्टकम"                                            

(१) व्रजे प्रसिद्धं नवनीतचौरं
    गोपाङ्गनानां च दुकूलचौरम्
    अनेकजन्मार्जितपापचौरं
    चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि॥

अर्थ - (1) व्रज में प्रसिद्ध, माखन चुरानेवाले एवं गोपियों के चीर चुरानेवाले, अपने आश्रितजनों के अनेक जन्मों के द्वारा उपार्जित पापों को चुराने वाले चौराग्रगण्य पुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ। 



(२)   श्री राधिकाया हृदयस्य चौरं
       नवाम्बुदश्यामलकान्तिचौरम्

       पदाश्रितानां च समस्तचौरं
       चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि॥

अर्थ -(2) श्रीमति राधिका के हृदय को चुरानेवाले, नूतन जलधार की श्यामकान्ति चुराने वाले एवं निजचरणाश्रितों के समस्त पाप-ताप चुराने वाले चौराग्रगण्य पुरुष को मैं प्रणाम करता हूँ।



(३) अकिञ्चनीकृत्य पदाश्रितं यः
     करोति भिक्षुं पथि गेहहीनम
     केनाप्यहो भीषणचौर ईदृग्दृष्टः
     श्रुतो वा न जगत्त्रयेऽपि॥

अर्थ -(3)
जो अपने चरणाश्रितों को निष्कञ्चन बनाकर मार्ग में घूमने वाले अनिकेत-भिक्षुक बना देता है, हाया ऐसा भयंकर चोर तो किसी ने तीनों लोकों में भी देखा या सुना नहीं।



(४)
यदीय नामापि हरत्यशेषं

      गिरिप्रसारानपि पापराशीन्

   आश्चर्यरूपो ननु चौर ईदृग्दृष्टः
   श्रुतो वा न मया कदापि॥

अर्थ - (4) जिसका नाम मात्र लेना भी, पर्वत के समान विशाल पापसमूह को भी समूल हर लेता है. ऐसे आश्चर्य रूपदाला चोर तो मैंने कभी भी कहीं देखा या सुना नहीं।



(५) धनं च मानं च तथेन्द्रियाणि
      प्राणांश् च हृत्वा मम सर्वमेव
      पलायसे कुत्र धृतोऽद्य चौर
      त्वं भक्तिदाम्नासि मया निरुद्धः

अर्थ -(5)
हे चोर.! मेरे धन मान इन्द्रियाँ प्राण एवं सर्वस्व को हर कर कहाँ भागे जा रहे हो? क्योंकि आज तो तुम भक्ति रूप रज्जू धारण कर मेरे द्वारा रोक लिए गए हो।



(६) छिनत्सि घोरं यमपाशबन्धं
     भिनत्सि भीमं भवपाशबन्ध

     छिनत्सि सर्वस्य समस्तबन्धं

    नैवात्मनो भक्तकृतं तु बन्धम्॥

अर्थ -(6)
क्योंकि तुम, यमराज के भयंकर पाशबन्धन को तो काट देते हो एवं संसार के भयंकर पाशबन्धन को विदीर्ण कर देते हो तथा सभीजनों के समस्त बन्धन को काट देते हो किन्तु अपने प्रेमीभक्त के द्वारा रचे गए अपने प्रेममय बन्धन को, तो तुम नहीं काट पाते हो।



(७) मन्मानसे तामसराशिघोरे
कारागृहे दुःखमये निबद्धः
लभस्व हे चौर! हरे! चिराय
स्वचौर्यदोषोचितमेव दण्डम्॥

अर्थ -(7) हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले चोर रूप हरे, मैंने, आज तुमको अज्ञानरूप अन्धकार समुदाय से भयंकर एवं दुःखमय मेरे मनरूपी-कारागार में बन्द कर लिया है अतः अपनी चोरीरूप-दोष के उचित दण्ड को ही, बहुत समय तक प्राप्त करते रहा।



(८) कारागृहे वस सदा हृदये मदीये
      मद्भक्तिपाशदृढबन्धननिश्चलः सन्
     त्वां कृष्ण हे! प्रलयकोटिशतान्तरेऽपि
    सर्वस्वचौर! हृदयान्न हि मोचयामि॥

अर्थ -(৪) हे मेरा सर्वस्व चुराने वाले कृष्ण.! मेरी भक्ति रूप पाश के दृढ़बन्धन में निश्चल होकर मेरे हृदयरूप- करागार में सदैव निवास करते रहो क्योंकि मैं तो अपने हृदयरूप करागार से, करोड़ों कल्पों में भी विमुक्त नीं करूँगा। इस अष्टक में उपजाति नामक छन्द है।



पुरषोत्तम मास में प्रतिदिन इस "श्रीचौर अग्रगण्य अष्टकम" स्त्रोत का पाठ किया जाता है। इससे भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा प्राप्त होती है, तो पुरषोत्तम मास में प्रतिदिन इसे पढ़ें एवं इसे दुहराने का प्रयास करें।

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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