Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Yatra
Shanka
Health
Pandit Ji

श्री नाथ जी के राजभोग दर्शन

  Views : 2387   Rating : 4.3   Voted : 3
Rate Article

प्रातःकालीन श्री नाथ जी के राजभोग दर्शन  


प्रातःकालीन दर्शन में ये अंतिम दर्शन होता है.इस चतुर्थ दर्शन में श्रीनाथजी के दर्शन का भाव है तथा "श्रीकुम्भनदासजी" कीर्तन करते है। दिवस लीला में अर्जुन सखा व रात्रि विहार में बिसारवा सहचरी की इस दर्शन में आसक्ति है। इसमें कूल्हे का श्रृंगार व निकुंज लीला का अनुभव
, हृदय स्थान से प्राकट्‌य है। अन्योर में सद्‌दु पांडे के नीम के वृक्ष नीचे श्रीगिरिराजजी में इनका निवास है।


यह दर्शन भव्यतम होते है। गोवर्धन निवास के दौरान प्रभु का घर चन्द्रसरोवर पर था अतः राजभोग के लिए फूल धारिये को जोर से आवाज ही जाती थी। उसी भावना के अनुसार आज भी एक सेवक द्वारा छत से बुलन्द आवाज में माला बोली का प्रचलन है। माला बोलने के कुछ ही समय बाद ये दर्शन के लिए खुलते हैं। श्रृंगार भी बहुत भारी और मूल्यवान होता है। कुसुमहार (माला) धराने के बाद ये दर्शन खुलते है। ये दर्शन देवाधिदेव श्रीनाथजी के भाव से है।


सखडी
, अनसखडी सभी प्रकार का भोग अरोगाया जाता है, जिसमें स्वादिष्ट, पौष्टिक-पवित्र पकवानों तथा लड्‌डू, वासुन्दी, पुडी, खीर, आम्ररस आदि का समावेश होता है। आरती की जाती है। राजभोग के उपरान्त श्रीजी का अनोसर होता है और पट बन्द हो जाते है। यह प्रभु के विश्राम का समय माना जाता है।

 

                                                          राजभोग दर्शन की भावना 

प्रभु के गोचारण की बात सोचकर यशोदा मैया चिन्ता कर रही है कि मेरे लाल ग्वाल बालों के साथ वन प्रांत में भूखे होगे। माता व्याकुल हो रही है किन्तु अत्यन्त प्रेम में गोपियों द्वारा अपने लाडले गोपाल कन्हैया के लिए सरस मीठे पकवान, विभिन्न प्रकार की स्निग्ध सुस्वादु सामग्री सिद्ध कर रही है और सारी सामग्री स्वर्ण और रजत पात्रों में सजाकर गोपियों के साथ प्रभु को आरोगने के लिए भिजवा रही है। माता गोपियों को सावधान कर रही है कि सामग्री अच्छी तरह रखना कही दूसरी मे न मिल जाय। गोपियां राजभोग नन्नदनन्दन के समक्ष पधाराती है प्रभु लीला पूर्वक कालिन्दी के तट पर बैठकर भोजन आरोग रहे है।

 

यह दर्शन राजाधिराज स्वरूप में ब्रज से पधारने के भाव से है। इस दर्शन में प्रभु की झांकी के अद्भुत दर्शन होते है क्योंकि देवगण, गन्धर्वगण, अप्सराएं आदि ब्रज पधारते है। भोग धरे जाते है। गोप - गोपियों के आग्रह से लीला - बिहारी मदनमोहन गिरिराज पधार कर कन्द मूल फलादि आरोगते है। यह झांकी अद्भुत है। प्रभु वन प्रांत से घर आने को उत्सुक है।

 

छबिले लाल की यह बानिक बरनत बरनि न जाई।

देखत तनमन कर न्योछावर, आनन्द उर न समाई॥

कन्द, मूल फल आगे धरिके, रही सकल सिर नाई।

गोविन्दी प्रभु पिय सौ रति मान, पठई रसिक रिझाई॥



राजभोग दर्शन का समय 

शीतकाल में- राजभोग 10-30 से 11-15 तक

ग्रीष्‍मकाल में- 11-00 से 11-45 तक



DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
Enter comments


 
श्रीनाथ जी मंदिर
Last Viewed Articles
eBook Collection
सभी किताबे
राधा संग्रह
ग्रन्थ
कृष्ण संग्रह
व्रज संग्रह
व्रत कथाएँ
यात्रा
DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
Copyright © radhakripa.in>, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here.