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मीरा चरित्र - यह पारस लोहे को भी पारस बना देता है

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क्रमशः से आगे ..................
वचन टूटने के पछतावे से भोजराज का मन तड़प उठा ।प्रातःकाल सबने सुना कि महाराजकुमार को पुनः ज्वर चढ़ आया है ।बाँह का सिया हुआ घाव भी उधड़ गया ।फिर से दवा - लेप सब होने लगा , किन्तु रोग दिन-दिन बढ़ता ही गया ।यों तो सभी उनकी सेवा में एक पैर पर खड़े रहते थे , किन्तु मीरा ने रात -दिन एक कर दिया ।उनकी भक्ति ने मानों पंख समेट लिए हो ।पूजा सिमट गई और आवेश भी दब गया ।

भोजराज बार बार कहते ," आप आरोग लें ।अभी तक आप विश्राम करने नहीं गईं ? मैं अब ठीक हूँ- अब आप विश्राम कर लीजिए ।अभी पीड़ा नहीं है ।आप चिन्ता न करें ।"

मीरा को नींद आ जाती तो भोजराज दाँतों से होंठ दबाकर अपनी कराहों को भीतर ढकेल देते ।

ऐसे ही कितने दिन -मास निकलते गये ।पर भोजराज की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ ।फिर भी मुस्कुराते हुये एक दिन उत्सव का समय जान कहने लगे ," आज तो वसंत पंचमी है ।ठाकुर जी को फाग नहीं खेलायी ? क्यों भला ? आप पधारिये , उन्हें चढ़ाकर गुलाल का प्रसाद मुझे भी दीजिये ।"

एक दो दिनों के बाद उन्होंने मीरा से कहा - आज सत्संग क्यों रोक दिया ।? यह तो अच्छा नहीं हुआ । आप पधारिये , मैं तो अब ठीक हो गया हूँ ।" वे कहते ,मुस्कराते पर उनके घाव भर नहीं रहे थे ।

            " आपसे कुछ अर्ज़ करना चाहता हूँ मैं " एक दिन एकान्त में भोजराज ने मीरा से कहा ।
       " जी फरमाईये " समीप की चौंकी पर बैठते हुये मीरा ने कहा ।

   " मैं आपका अपराधी हूँ ।मेरा आपको दिया वचन टूट गया " भोजराज ने अटकती वाणी में नेत्र नीचे किए हुये कहा - " आप जो भी दण्ड बख्शें , मैं झेलने को प्रस्तुत हूँ ।केवल इतना निवेदन है कि यह अपराधी अब परलोक - पथ का पथिक है ।अब समय नहीं रहा पास में ।दण्ड ऐसा हो कि यहाँ भुगता जा सके ।अगले जन्म तक ऋण बाक़ी न रहे ।" उन्होंने हाथ जोड़कर सजल नेत्रों से मीरा की ओर देखा ।

              " अरे, यह क्या ? आप यूँ हाथ न जोड़िये ।" फिर गम्भीर स्वर में बोली -" मैं जानती हूँ ।उस समय तो मैं अचेत थी, किन्तु प्रातः साड़ी रक्त से भरी देखी तो समझ गई कि अवश्य ही कोई अटक आ पड़ी होगी ।इसमें अपराध जैसा क्या हुआ भला ?"
 " अटक ही आ पड़ी थी " भोजराज बोले - याँ तो आपको झरोखे से गिरते देखता याँ वचन तोड़ता ।इतना समय नहीं था कि दासियों को पुकारकर उठाता ।क्यों वचन तोड़ा , इसका तनिक भी पश्चाताप नहीं है, किन्तु भोज अंत में झूठा ही रहा........ ।" भोजराज का कण्ठ भर आया ।तनिक रूक कर वे बोले ," दण्ड भुगते बिना यह बोझ मेरे ह्रदय पर रहेगा ।"
      " देखिये , मेरे मन में तनिक भी रोष नहीं है ।मैं तो अपने ही भाव में बह गिर रही थी - तो मरते हुये को बचाना पुण्य है कि पाप ? मेरी असावधानी से ही तो यह हुआ ।यदि दण्ड मिलना ही है तो मुझे मिलना चाहिए , आपको क्यों ?"
        
             " नहीं ,नहीं ।आपका क्या अपराध है इसमें ?"भोजराज व्याकुल स्वर में बोले -" हे द्वारिकाधीश ! ये निर्दोष है ।खोटाई करनहार तो मैं हूँ ।तेरे दरबार में जो भी दण्ड तय हुआ हो ,वह मुझे दे दो ।इस निर्मल आत्मा को कभी मत दुख देना प्रभु !" भोजराज की आँखों से आँसू बह चले ।

              " अब आप यूँ गुज़री बातों पर आँसू बहाते रहेंगे तो कैसे स्वस्थता लाभ करेगें ? आप सत्य मानिये , मुझे तो इस बात में अपराध जैसा कुछ लगा ही नहीं " मीरा ने स्नेह से कहा ।

           " आपने मुझे क्षमा कर दिया ,मेरे मन से बोझ उतर गया "भोजराज थोड़ा रूक कर फिर अतिशय दैन्यता से  बोले ," मैं योग्य तो नहीं, किन्तु एक निवेदन और करना चाहता था ।"
           " आप ऐसा न कहे, आदेश दीजिए , मुझे पालन कर प्रसन्नता होगी ।"

           " अब अन्त समय निकट है ।एक बार प्रभु का दर्शन पा लेता........... ।"

मीरा की बड़ी बड़ी पलकें मुँद गई ।भोजराज को लगा कि उनकी आँखों के सामने सैकड़ों चन्द्रमा का प्रकाश फैला है ।उसके बीच में खड़ी वह साँवरी मूरत , मानों रूप का समुद्र हो, वह सलोनी छवि नेत्रों में अथाह स्नेह भरकर बोली -" भोज ! तुमने मीरा की नहीं , मेरी सेवा की है ।मैं तुमसे प्रसन्न हूँ ।"

              " मेरा अपराध प्रभु !" भोजराज अटकती वाणी में बोले ।

वह मूरत हँसी , जैसे रूप के समुद्र में लहरें उठी हों ।" स्वार्थ से किए गये कार्य अपराध बनते है भोज ! निस्वार्थ से किए गये कार्यों का कर्मफल तो मुझे ही अर्पित होता है ।तुम मेरे हो भोज ! अब कहो, क्या चाहिए तुम्हें ?" उस मोहिनी मूर्ति ने दोनों हाथ फैला कर भोजराज को अपने ह्रदय से लगा लिया ।

आनन्द के आवेग से भोजराज अचेत हो गये ।जब चेत आया तो उन्होंने हाथ बढ़ा कर मीरा की चरण रज माथे चढ़ायी ।पारस तो लोहे को सोना ही बना पाता है, पर यह पारस लोहे को भी पारस बना देता है ।दोनों ही भक्त आलौकिक आनन्द में मग्न थे ।

क्रमशः ............

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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