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ज्ञान , भक्ति और कर्म सरल साधन है

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क्रमशः से आगे...............

मीरा ने भोजराज को आसक्ति के बारे में बताया कि यों तो आसक्ति बुराइयों की जड़ है , पर अगर यही आसक्ति भक्ति याँ किसी सच्चे भक्त में हो जाये तो कल्याणकारी हो सकती है ।

           " यदि भक्त में आसक्ति होने से कल्याण सम्भव है तो फिर मुझे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं ।आप परम भक्तिमती है और मुझमें आसक्त के सारे लक्षण जान पड़ते है
" भोजराज ने संकोच से कहा ।

           " मनुष्य का जीवन बाजी जीतने के लिए मिलता है ।कोई हारने की बात सोच ही ले तो फिर उपाय क्या है ?" मीरा ने कहा ।

           " विश्वास की बात न फरमाइयेगा ।वह मुझमें नहीं है ।उसके लिए तो आपको ही मुझ पर दया करनी पड़ेगी । मेरे योग्य कोई सरल उपाय हो तो बताने की कृपा करें ।"

           " भगवान का जो नाम मन को भाये, उठते -बैठते  ,चलते-फिरते और काम करते लेते रहे ।मन में प्रभु का नाम लेना अधिक अच्छा है, किन्तु मन धोखा देने के अनेक उपाय जानता है ।बहुत बार साँस की गति ही ऐसी हो जाती है कि हमें जान पड़ता है कि मानों मन नाम ले रहा है ।अच्छा है ,आरम्भ मुख से ही किया जाये ।इसके साथ ही यदि सम्भव हो तो जिसका नाम लेते है, उसकी छवि का , रूप माधुरी का ध्यान किया जाये , उसकी लीला माधुरी के  चिन्तन की चेष्टा की जाये ।एक तो इस प्रकार मन खाली नहीं रहेगा और दूसरे मन में उल्टे सीधे विचार नहीं आ पायेंगे ।"

              " जी ! अब ऐसा ही प्रयत्न करूँगा ।"भोजराज ने समझते हुये कहा ।

भोजराज किसी राज्य के कार्य से उठकर गये तो देवर रत्नसिंह भाई को ढूढँते इधर आ निकले । उस दिन भाई से हुई वार्ता के पश्चात  रत्नसिंह  की दृष्टि में अपनी भाभीसा का स्वरूप पहले से कहीं अधिक सम्माननीय एवं पूजनीय हो गया था ।मीरा ने झटपट दासियों की सहायता से जलपान और दूसरे मिष्ठान्न स्नेह से दिए ।" अरोगो लालजीसा !इस राजपरिवार में अपनी भौजाई को 'औगणो' ही समझ लीजिए । गिरधरलाल की सेवा में रहने के कारण अधिक कहीं आ जा नहीं पाती ।भली-बुरी जैसी भी हूँ , आप सभी की दया है , निभा रहे हैं ।"

           " ऐसा क्यों फरमाती हैं आप ? " रत्नसिंह ने प्रसाद लेते हुये कहा ।" हमारा तो सौभाग्य है कि हम आपके बालक है ।लोग तीर्थों और भक्तों के दर्शन के लिए दूर दूर तक भटकते फिरते है ।हमें तो विधाता ने घर बैठे ही आपके स्वरूप में तीर्थ सुलभ कराये है ।मेरा तो आपसे हाथ जोड़ कर यही निवेदन है कि जो आपको न समझ पाये और जो कोई कुछ कह भी दे, तो उन्हें नासमझ मानकर आप उनपर कृपा रखिये ।"

          " यह क्या फरमाते है आप ? किसपर नाराज़ होऊँ लालजीसा ! अपने ही दाँतों से जीभ कट जाये तो क्या हम दाँतों को तोड़ देते है ? सृष्टि के सभी जन मेरे प्रभु के ही सिरजाये हुये ही तो है ।इनमें से किसको बुरा कहूँ ?"


रत्नसिंह ने स्नेह से अपनी अध्यात्मिक जिज्ञासा रखते हुये कहा ," एक बात पूँछू भाभीसा हुकम ? अगर समस्त जगत ईश्वर से ही बना है, तो आप  गिरधर गोपाल की मूर्ति के प्रति ही इतनी समर्पित क्यूँ है ? हम सबमें भी उतना ही भगवान है जितना उस मूर्ति में, फिर उसका इतना आग्रह क्यों और दूसरों की इतनी उपेक्षा क्यों ?संतों के साथ का उत्साह क्यों , और दूसरों के साथ का अलगाव का भाव क्यों ?"


"आखिर मेवाड़ के राजकुवंर मतिहीन कैसे होंगे ?"मीरा हँस दी- " बहुत सुन्दर प्रश्न पूछा है आपने लालजीसा ।जैसे इस सम्पूर्ण देह की रग रग में आप है और इसका कोई भी अंग आपसे अछूता नहीं - इतने पर भी आप सभी अंगों और इन्द्रियों से एक सा व्यवहार नहीं करते ।ऐसा क्यों भला ? आपको कभी अनुभव हुआ कि पैरों से मुँह जैसा व्यवहार न करके उनकी उपेक्षा कर रहे है ? गीता में भी भगवान ने समदर्शन का उपदेश दिया है समवर्तन का नहीं ।चाहने पर भी हम वैसा नहीं कर सकेंगे ।वैसे भी यह जगत सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों का विकार है ।इन तीनों के समन्वय से ही पूर्ण सृष्टि का सृजन हुआ है ।"

रत्नसिंह धैर्य से भाभीसा का कहा एक एक शब्द का भावार्थ ह्रदयंगम करते जा रहे थे ।

मीरा ने फिर सहजता से ही कहा ,"  अच्छा और बुरा क्या है? यह समझना उतना ही महत्वपूर्ण  है जितना यह कि आप उसको कहाँ और किससे जोड़ते है ।रावण और कंस आदि ने तो बुराई पर ही कमर बाँधी और मुक्ति ही नहीं , उसके स्वामी को भी पा लिया ।"

"पर अगर मैं अपनी समझ से कहूँ तो अपने सहज स्वभावानुसार चलना ही श्रेष्ठ है ।ज्ञान , भक्ति और कर्म सरल साधन है । इन्हें अपनाने वाला इस जन्म में नहीं तो अन्य किसी जन्म में अपना लक्ष्य पा ही लेगा ।जैसे छोटा बालक उठता -गिरता-पड़ता अंत में दौड़ना सीख ही लेता है , वैसे ही मनुष्य सत् के मार्ग पर चलकर प्रभु को पा ही लेता है ।"

रत्नसिंह मन्त्रमुग्ध सा मीरा के उच्चारित प्रत्येक शब्द का आनन्द ले रहा था और अन्जाने में ही मीरा की प्रेम भक्ति धारा में एक और सूत्र जुड़ता जा रहा था- और रत्नसिंह भी चाहे बेखबर ही , पर इस भक्ति पथ पर अग्रसर होने का शुभारम्भ कर चुका था ।



क्रमशः ...................

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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