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उद्धव गोपियों और भ्रमरगीत

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उद्धव जी नित्य कर्म से निवृत होकर यमुना जी के तट पर आ पहुँचे तभी गोपियों ने देखा कि श्रीकृष्ण के सेवक उद्धवजी है जिनकी आकृति और वेशभूषा श्रीकृष्ण से मिलती-जुलती है .सब-की-सब गोपियाँ उनका परिचय प्राप्त करने के लिए अत्यंत उत्सुक हो गयी और सब-की-सब चारो ओर से उद्धव जी को घेरकर खड़ी हो गयी.

 

जब उन्हें मालूम हुआ कि ये रमारमण श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर आये है तो उन्होंने मधुर वाणी से उद्धवजी का अत्यंत सत्कार किया और एकांत में आसन पर बैठाकर वे उनसे कहने लगी – हम जानती है आप यदुनाथ के पार्षद है और उन्ही का सन्देश लेकर यहाँ आये है दूसरों के साथ जो प्रेम का सम्बन्ध का स्वाँग किया जाता है वह तो किसी न किसी स्वार्थ के लिए ही होता है.भौरों का पुष्पों से,और पुरुषों का स्त्रियों से ऐसा ही स्वार्थ का प्रेम सम्बन्ध होता है,अध्यापन समाप्त हो जाने पर कितने शिष्य अपने आचार्यो की सेवा करते है,जब वृक्ष पर फल नहीं रहते तो पक्षीगण वहाँ से बिना कुछ सोचे विचारे उड़ जाते है,गोपियों के मन,वाणी और शरीर श्रीकृष्ण में इतने तल्लीन हो गये थे कि वे यह भूल ही गयी कि कौन-सी बात,किस तरह,किसके सामने कहनी चाहिए.वे लज्जा को भूल गयी. और फूट-फूटकर रोने लगी.

 

उसी समय एक गोपी ने देखा कि पास ही एक भौरा गुनगुना रहा है उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्ण ने मनाने के लिए दूत भेजा हो वह गोपी उलाहना देते हुए भौरे से इस प्रकार कहने लगी – रे मधुप !तू कपटी का सखा है इसलिए तू भी कपटी है तू हमारे पैरों को मत छू,झूठे प्रणाम मत कर हम जानती है तू अनुनय-विनय करने बड़ा निपुण है मालूम होता है तू श्रीकृष्ण से ही यही सीखकर आया है कि रूठे हुए को मनाने के लिए दूत को कितनी चाटुकारिता करनी चाहिए परन्तु तू समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलने की.तू स्वयं भी तो किसी कुसुम से प्रेम नहीं करता यहाँ-से-वहाँ उड़ा करता है जैसा तेरा स्वामी वैसा ही तू !,जैसा तू काला,वैसे ही वे भी है,उन्होंने हमें केवल एक बार अपनी तनिक-सी मोहनी और परम मादक अधरसुधा पिलायी थी और फिर वे ऐसे निर्मोही निकले कि हम भोली-भाली गोपियों को छोडकर यहाँ से चले गए.

 

फिर गोपी कहने लगी – ‘भ्रमर तू दूर मत जा’कृष्ण चर्चा कर. तू यह कहे कि ‘जब ऐसा है तब तुम लोग उनकी चर्चा क्यों करती हो’ तो भ्रमर! हम सच कहती है एक बार जिसे उसका चसका लग जाता है वह उसे छोड नहीं सकता. हमारा तो जीवनप्राण आधार है वो, हमें और किसी से क्या लेना-देना.

 

उद्धवजी ने कहा –भगवान ही सबके उपादान कारण होने से सबकी आत्मा है सब में अनुगत है और आत्मा,माया और माया के कार्यों से पृथक है कोई भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते. माया की तीन वृतिया है.सुषुप्ति, स्वप्न, और जाग्रत.मनुष्य को चाहिए कि वह समझे कि स्वप्न में दीखने वाले पदार्थो के समान ही जागृत अवस्था में इन्द्रियों के विषय का चिंतन करने वाले मन और इन्द्रियों को रोक ले और विषयों को त्याग कर भगवान का साक्षात्कार करे.

 

गोपियों ने कहा-उद्धवजी ये जो आप ज्ञान और साधन की बात कर रहे है तो आप को पहले ही बता दे कि प्रेम की प्रतिमा पर कोई भी रंग नहीं चढ़ने वाला, हमारे मन पर, एक साँवरे का रंग चढ गया, सो चढ गया, उस रंग के आगे सारे रंग फीके है. हम नीति-अनीति नही जानती है हम तो बस, एक प्रीत की रीत, चली गयी, सो चली गयी.

 

“ श्याम तन, श्याम मन, श्याम ही हमारो धन, आठो याम उद्धो हमें श्याम ही सो काम है,

         श्याम हिये, श्याम जिये, श्याम बिना नाहीं जिये, आंधे की सी लाकडी आधार नाम श्याम है,

      श्याम गति, श्याम मति, श्याम ही है प्राणपति, श्याम सुख धाम सो भलाई आठो याम है, 

  उद्धो तुम भये बौरे, पाती लेके आये दौड़े, योग कहाँ राखे, यहाँ रोम-रोम श्याम है..”

 

ज्ञानी साधना करके अपने आपको खाली करता जाता है और प्रेमी अनुराग और प्रेम से अपने को भर लेता है.ज्ञानी धीरज के साथ आगे बढ़ता जाता है पर प्रेमी के अंदर धीरज कहाँ होता है बस अपने प्रियतम की एक झलक मिल जाये इतना ही बहुत है ‘हा कृष्ण प्यारे! सुबह से दोपहर हो गयी, दोपहर से शाम हो गयी कब आपके दर्शन होगे, ये अधीरता ही उसका भूषण होता है. साधना में ध्यान लगाना पडता है.पर इस दिल में जब कृष्ण की याद होती है तो कभी वेदना रूपी बिजली भी चमकती है तो कभी गम की घनघोर घटा भी गरजती है और इन आँखों से बरसात भी होती है. और उस बरसात में भीगने का मजा हमारे सिवा और कौन जान सकता है.

 

कृष्ण प्रेम में एक बूंद आँसू भी यदि आँख से गिर जाये वह ध्यान,साधना से कही बढ़कर है.उद्धवजी तुम्हे ऐसा लगता है कि हमारा श्रीकृष्ण से विरह है,पर हमारे लिए तो विरह का मतलब विशेष योग’है.जब कृष्ण व्रज में थे तो हम हर पल उनका दर्शन नहीं कर पाती थी पर अब तो पल-पल हम,जब चाहे उनका दर्शन कर सकती है. हमें किसी भी प्रकार का बंधन नहीं है इस व्रज में तो सब गोपाल के ही उपासी है यहाँ कोई धुनी नहीं लगाता .

 

“ हम प्रेमनगर की बंजारिन, जप, तप, और साधन क्या जाने, हम श्याम के नाम की दीवानी,

  व्रत, नेम के बंधन क्या जाने, हम ब्रज की भोरी ग्वारनिया, हम ज्ञान की उलझन क्या जाने,

  ये प्रेम की बाते है उद्धो, कोई क्या समझे, कोई क्या जाने, मेरे और मोहन की बाते, या मै जानू, या वो जाने..

 

हमारे प्यारे श्यामसुन्दर ने जिनकी कीर्ति का गान बड़े-बड़े महात्मा करते रहते है हमसे एकांत में जो मीठी मीठी प्रेम की बाते की है उन्हें छोडने का भुलाने का उत्साह भी हम कैसे कर सकती है ?उद्धवजी यह वही नदी है जिसमे वे बिहार करते थे,ये वे ही वन है जिनमे वे रात्रि के समय रास लीला करते थे,यह वही पर्वत है जिसके शिखर पर चढ़कर वे बाँसुरी बजाते थे,और ये वे ही गौए है जिनको चराने के लिए वे सुबह शाम हम लोगो को देखते हुए जाते-आते थे,यहाँ का एक-एक प्रदेश,एक-एक धूलि कण उनके परम सुन्दर चरणकमलो से चिन्हित है इन्हें जब-जब हम देखती है दिनभर यही तो करती रहती है, तब-तब वे हमारे प्यारे श्यामसुन्दर नंदनंदन को हमारे नेत्रों के सामने लाकर रख देते है. उद्धवजी! हम किसी भी प्रकार मरकर भी उन्हें भूल नहीं सकती हमारा मन तो हमारे वश में ही नहीं है अब हम उन्हें भूले तो किस तरह?

 

 “ घर तजू, वन तजू, नागर-नगर तजू, वंशीवट तट तजू, काहू पे ना लज हो,ये देह तजू, गेह तजू, पर नेह कहो कैसे तजू,

   आज सारे राज बीच ऐसे साज सज हो,ये बाबरो भयो है लोक, बाबरी कहे मोको, ऐरी! बाबरी कहेते पे मै, काहू न बरज हो,

   कहैया-सुनैया तजू, बाप और भईया तजू, दईया तजू, मईया, पे कन्हैया ना ही तज हो..”

 

उद्धवजी ने जब गोपियों का श्रीकृष्ण से ऐसा प्रेम देखा तो उनकी ज्ञान की पोटली यमुनाजी के पुलिन में ही खो गयी.वे भी श्रीकृष्ण के प्रेम और आनंद से भर गए.और वे इस प्रकार कहने लगे – इस पृथ्वी पर केवल इन गोपियों का ही शरीर धारण करना श्रेष्ट और सफल है क्योकि ये सर्वात्मा भगवान श्रीकृष्ण के परम प्रेममय दिव्य महाभाव में स्थित हो गयी है गोपियों तुमने ये सिद्ध किया है कि कोई भगवान के स्वरुप और रहस्य को न जानकर भी उनसे प्रेम करे,तो वे स्वयं अपनी शक्ति से,अपनी कृपा से,उसका परम कल्याण कर देते है मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मै इस वृन्दावनधाम में - कोई झाड़ी, लता या ओषधि - जड़ी-बूटी ही बन जाऊँ. यदि में ऐसा बन जाऊँगा तो मुझें व्रजागनाओ की चरणधूलि निरंतर सेवन करने के लिए मिलती रहेगी. इनकी चरणरज में स्नान करके मै धन्य हो जाऊँगा. धन्य है ये गोपियाँ! धन्य इनका प्रेम!धन्य वे ठाकुर है!मै नंदबाबा के व्रज में रहने वाली गोपियों की चरणधूलि को बारम्बार प्रणाम करता हूँ उसे सिर पर चढ़ता हूँ.

 

इस प्रकार उद्धवजी व्रज में कई महीनो तक रहे,फिर मथुरा लौटकर आ गए .और कृष्णजी से कहने लगे आप बहुत निष्ठुर हो.गोपियाँ आप से कितना प्रेम करती है और आपने उन्हें क्या दिया?उन्हें आप छोडकर आ गए.जो ये शब्द उद्धवजी के मुहँ से भगवान ने सुने भगवान समझ गए उद्धव की भक्ति की चादर में प्रेम का रंग चढ गया है.

 

भगवान ने कहा – उद्धव मेरे खजाने में जो सबसे अनमोल रत्न था वही मैंने गोपियों को दिया, वह है विरहजो मुझसे भी बड़ा है. गोपियों के प्रेम का ऋण इतना बढ़ गया था मै जान ही नहीं पा रहा था कि उस कर्ज को कैसे चुकाऊँ.गोपियो के प्रेम के आगे यदि में अपने त्रिभुवन को गिरवी भी रख दूँ और खुद को भी बेच दूँ, तो भी में उनके प्रेम का ब्याज तो क्या, मूलधन भी नहीं दे सकता.सच बात तो ये है उद्धव, इस कर्ज के कारण ही मै अपना मुहँ छिपाकर मथुरा भाग आया हूँ.ये कृष्ण तो गोपियों का गुलाम सदा रहेगा.

सार-

वृंदावन की  हर एक चीज दिव्य है. वहाँ सारे देवी-देव ही वृक्ष, झाड़ी, लता-पता, किसी रूप में है ताकि जब भक्तजन चले और उनके चरणों की धूल उड़े तो उनके मस्तक पर पड़ जाये, और वे धन्य हो जाये. 

जय जय श्री राधे

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2011-05-03 19:22:24 By ??? ???????

जय जय श्री राधे!

2011-04-14 01:29:28 By KAILASH CHANDRA SHARMA

HEY PARAM KRIPALU KRISHNA , THODI MERI BHI SUDH LEEJO , JAISI KRIPA UDDHAV PAR KAR GOPIAN SHARAN DINHO /,KHOPADIYA PAR BOJH AHANKAR KO,PREMHIN HRIDAY PADO HAI SUNO/ KARO KRIPA MOPE BHI JAISE UDHDAV PAR KINO.

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