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१० वा ज्योतिर्लिंग - जाने कैसे स्थापित हुआ श्री त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग

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स्थान - त्रयम्बकेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से १० वा ज्योतिर्लिंग है, यह ज्योतिर्लिग गोदावरी नदी के करीब, महाराष्ट्र राज्य के "नासिक" जिले में स्थित है. इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकत ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है. इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरु होती है. भगवान शिव का एक नाम त्रयम्बकेश्वर भी है.

स्थापना - पेशवा काल में इस मंदिर के रखरखाव पर अत्यधिक व्यय किया गया. माना जाता है कि इस मंदिर का पुननिर्माण 1755 से शुरु होकर 1786 तक हुआ. इस मध्य अवधि में इस मंदिर का व्यय लगभग 16 लाख के करीब था. जो काफी अधिक था. 

कहा जाता है. कि भगवान शिव से गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर भगवान शिव को यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में रहना पडा था. भगवान शिव के नाम से ही त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग आज श्रद्धा और विश्वास का स्थल बन चुका है. गोदावरी नदी और ब्रह्मा गिरि पर्वत की शोभा बढाने वाले भगवान त्रयम्बकेश्वर भगवान शिव की महिमा अद्भुत है.

विग्रह - इस मंदिर में एक मुख्य ज्योतिर्लिंग के अलावा तीन छोटे-छोटे लिंग है. यहां के ये तीनों शिवलिंग ब्रह्मा, विष्णु और शिव के प्रतीक माने जाते है. धार्मिक शास्त्रों शिवपुराण में भी त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है. कहा जाता है, कि ब्रह्रागिरि पर्वत पर जाने के लिए यहां सात सौ सीढियां है. इन सीढियों से ऊपर जाने के मध्य मार्ग में रामकुण्ड और लक्ष्मणकुण्ड है.

ब्रहागिरि पर्वत पर पहुंचने पर गोदावरी नदी के उद्गम स्थल के दर्शन होते है. त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग इसलिए भी अपनी विशेषता रखता है कि यहां मात्र भगवान शिव की ही पूजा नहीं होती है. बल्कि भगवान शिव के साथ-साथ ब्रह्मा और विष्णु की भी लिंग रुप में पूजा की जाती है. अन्य सभी 11 ज्योतिर्लिंगों में भगवान शिव ही विराजित है, और वहां भगवान शिव ही मुख्य देव है, जिनकी पूजा की जाती है.


विशेषता - कालसर्प शान्ति स्थल - त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के भक्तों के लिए तो विशेष है ही साथ ही यह शनि शान्ति पूजा, त्रिपिंडी विधि पूजन, और कालसर्प शान्ति पूजा के लिए भी जाना जाता है. इन पूजाओं को अलग -अलग भक्त अपनी ज्योतिषिय शान्ति के लिए कराते है.

ब्रह्मागिरि पर्वत - त्रयंम्बकेश्वर मंदिर के निकट का गांव ब्रहागिरि के नाम से जाना जाता है. क्योकि यह गांव ब्रहागिरि पहाडी की तलहटी में स्थित है. ब्रहागिरि पर्वत भगवान शिव का साक्षात रुप है.

                                     त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग कथा

त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिग के संबन्ध में एक पौराणिक कथा प्रसिद्ध है.एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं. उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपकार करने के लिए प्रेरित किया. उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान्‌ श्रीगणेशजी की आराधना की. और माँगा किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें.' गणेश जी को विवश होकर यह कार्य करना पड़ा.

गणेश जी एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे. गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी. अब तो बड़ा हाहाकार मचा.

तब ब्राह्मणों ने कहा - गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो. फिर लौटकर यहाँ एक महीने तक व्रत करो. इसके बाद 'ब्रह्मगिरी' की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो. इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगरी की 11 बार परिक्रमा करो. फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा.

स्वयं पर लगे गौहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए गौतम ऋषि ने यहां कठोर तपस्या की थी. और भगवान शिव से गंगा नदी को धरती पर लाने के लिए वर मांगा था. गंगा नदी के स्थान पर यहां दक्षिण दिशा की गंगा कही जाने वाली नदी गोदावरी का उसी समय उद्गम हुआ था. भगवान शिव के तीन नेत्र है, इसी कारण भगवान शिव का एक नाम त्रयंबक भी है. अर्थात तीन नेत्रों वाला भी है.
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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