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जगन्नाथ जी की कथा

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जगन्नाथ भगवान की कथा

 

प्रसंग १. - इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अंजीर  वृक्ष के नीचे मिली थी.यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा मालवा  नरेश इंद्र द्युम्न को स्वप्न में यही मूति दिखाई दी थी.तब उसने कड़ी तपस्या की, और तब भगवान विष्णु  ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये, और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा.

उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये.राजा ने ऐसा ही किया, और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया.उसके बाद राजा को विष्णु और  विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए.किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे, और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये.

माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका, और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया, और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे.राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है, और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं.तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं.

 

मूर्तियों की स्थापना के बाद विष्णु ने राजा को वरदान दिया कि अश्वमेघ के समाप्त होने पर जहां इन्द्रद्युम्न ने स्नान किया है, वह बांध उसी के नाम से विख्यात होगा। जो व्यक्ति उसमें स्नान करेगा वह इंद्रलोक को जायेगा और जो उस सेतु के तट पर पिण्डदान करेगा उसके 21 पीढ़ियों तक के पूर्वज मुक्त हो जायेंगे।


 

प्रसंग २.- जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है.  कथा इस प्रकार है, एक बार द्वारका में श्री कृ्ष्ण की रानियों ने माता रोहिणी से निवेदन किया की वे उन्हें भगवान श्री कृ्ष्ण की ब्रजलीला, गोपियों, और उनके प्रेम प्रसंगों के विषय में कुछ बतायें. 

 

शुरु में माता ने उन्हें टालने का प्रयास किया और रानियों के द्वारा अत्यधिक आग्रह करने पर उन्होने वर्णन सुनाया. तब सुभद्रा को भवन के द्वार पर खडा रहने का आदेश दिया गया, और कहा गया कि किसी को भी अन्दर न आने दें. संयोगवश उसी समय श्री कृ्ष्ण और बलराम वहां आ गयें. सुभद्रा ने माता रोहिणी के आदेश का पालन करते हुए उन्हें वही रोक दिया.  

 

द्वार पर ही खडे खडे तीनों ने ब्रज प्रेम का वर्णन सुन लिया. देव ऋषि नारद जी ने भी यह सुना और देखा तो भगवान से विनती कि, हे भगवन आप इसी प्रेम रुप में यहां विराजित हों. भगवान श्री कृ्ष्ण ने नारद देव की बात मान ली. यहां के मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा तीनों की मूर्तियां है.

 

इन मूर्तियों की विशेषता है, कि इन मूर्तियों के पैर नहीं है, कंधे है, हाथ नहीं है. और ये मूर्तियां लकडी की बनी है. और प्रत्येक 12 वर्ष में इन्हें बदल दिया जाता है. साथ ही 12वीं सदी से ये रथ यात्रा चली आ रही है. जगन्नाथ पुरी यात्रा गुंदीचा मंदिर तक जाती है. इसके मार्ग में मौसीमा मंदिर में भगवान को खिचडी का भोग लगाया जाता है. 


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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