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परमा एकादशी

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अधिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम परमा एकादशीया पदमा एकादशी है.


परमा एकादशी की कथा 

काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण रहता था उनकी स्त्री अत्यंत पवित्र और पतिव्रता थी वह किसी पूर्वपाप के कारण अत्यंत दरिद्र थी उसे भिक्षा मांगने पर भी नहीं मिलतीं थी वह सदैव अपने पति की सेवा करती रहती थी वह अतिथि को अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी और पति से कभी किसी वस्तु के लिए नहीं कहती थी.

 

एक समय कौण्डिन्य मुनि उस जगह आये उनको आता देखकर सुमेघा सहित स्त्री ने प्रणाम किया और बोले की हम आज धन्य हो गए कि आप के दर्शन हुए उन्होंने उन्हें भोजन कराया फिर पतिव्रता बोली हे मुनि ! आप मुझे दरिद्रता का नाश करने की विधि बताइये.  

 

इस पर कौण्डिन्य मुनि बोले - मलमास की  कृष्णा पक्ष की परम एकादशी के व्रत से समस्त पाप दुख और दरिद्रता आदि के व्रत से समस्त पाप दुख और दरिद्रता आदि क्षय हो जाते है. जो मनुष्य इस व्रत को करता है वह धनवान हो जाता है, इस व्रत में नाच गान आदि सहित रात्रि जागरण करना चाहिये कुबेर को महादेव जी ने इसी व्रत के करने से धनाध्यक्ष बना दिया था

फिर मुनि ने कहा – हे ब्रह्माणी पंचरात्री व्रत इससे भी अधिक उत्तम है परम एकादशी के दिन प्रातः काल नित्य कर्म से निवृत होकर विधिपूर्वक पंचरात्री व्रत का आरंभ करना चाहिये जो पाँच दिन तक संध्या को भोजन करते है वे स्वर्ग को जाते है जो स्नान करके पाँच दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराते है उन्हें समस्त संसार के भोजन कराने का फल मिलाता है.

 

कौण्डिन्य मुनि के कहे अनुसार ब्रह्माणी ने परमा एकादशी का पाँच दिन का व्रत किया व्रत समाप्त होने पर उसने देखा कि एक राजकुमार उनके सामने खड़ा है उसने एक उत्तम घर जो सब वस्तुओ से सजा था रहने को दिया वे दोनों व्रत के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर अंत में स्वर्ग लोक को गए.

 

परमा एकादशी का महत्व

जो मनुष्य इस परमा एकादशी का व्रत करता है उसे समस्त तीर्थो व यज्ञ आदि का फल मिलता है.
 


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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