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क्या एकादशी मात्र को हरिवासर कहते है

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क्या एकादशी मात्र को हरिवासर कहते है,  तो उत्तर है - नहीं, ऐसा नहीं है हरिवासर अर्थात हरि का दिन मात्र उस एकादशी को कहते है "जिसमे द्वादशी का योग हो जाए" अर्थात एकादशी के दिन में ही उत्तरपाद में द्वादशी लग जाए अथवा द्वादशी के दिन पूर्वपाद में एकादशी रहे,कहने का तात्पर्य यह है कि "एकादशी के शेषपाद और द्वादशी के प्रथम पाद का योग ही हरिवासर है".


द्वादश्या: प्रथम:पादो 

हरिवासरसंज्ञक:

तमतिक्रम्य कुवीर्त पारणं विष्णु तत्पर:


अर्थात -
विष्णु धर्मोत्तर में वर्णित है – विष्णु भक्त (वैष्णव) को चाहिये कि उसका लड्घन (अतिक्रमण)करके अर्थात उस दिन व्रत करके, परदिन में ही पारण करे  और भी वर्णित है - एकादशी का योग होने से द्वादशी को हरिवासर कहा गया है इसमें भोजन करना सर्वथा निषिद्ध है.

अर्थात एकादशी के दिन में ही उत्तरपाद में द्वादशी लग जाए अथवा द्वादशी के दिन पूर्वपाद में एकादशी रहे अतः उसी दिन व्रत करने का विधान है भले ही ही पूर्व दिन सारा दिन एकादशी हो और वह भी दशमी बेध रहित शुद्ध एकादशी हो,उस दिन भोजन करना बड़ा निषेध है.


भविष्य पुराण में सब संशय का समाधान करते हुए स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि शुद्धा द्वादशी में व्रत करके द्वादशी कि कला मात्र भी त्रयोदशी में हो अथवा ना हो द्वादशी कि कलाविहीन त्रयोदशी में ही पारण करना चाहिए.उक्त द्वादशी का व्रत रखने से मनुष्य को पुनर्वार गर्भ में नहीं आना पडता.


यदि पूरा दिन एकादशी रहे और वृद्धि को प्राप्त होकर दूसरे दिन सूर्योदय पर्यंत व्याप्त रहे और द्वादशी तिथि त्रयोदशी में एक दंड भी द्रष्टिगोचर हो तो परदिन अर्थात द्वादशी में ही उपवास करना यति और गृहस्थ सब का कर्तव्य है.

 

 सम्पूर्णकादशी यत्र प्रभाते पुनरेव सा

तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यान्तु परणम

 

स्कन्द पुराण में स्पष्ट घोषणा है कि सम्पूर्णा एकादशी पुनर्वार प्रभात कला में भी होने पर दूसरे दिन यदि व्रत किया जाय तो शत यज्ञानुष्ठान जनित फल लाभ होता है, उक्त व्रत का पारण त्रयोदशी में होता है.    


"आषाढ़ शुक्ल द्वादशी"
को "अनुराधा", "भाद्र शुक्ल द्वादशी" को "श्रवण", "कार्तिक शुक्ल द्वादशी" को "रेवती" नक्षत्र के योग में श्री हरि का वास रहने में उसकी हरिवासर संज्ञा है. ऐसे योग पडने पर एकादशी व्रत के अतिरिक्त द्वादशी का भी व्रत (दो व्रत)करना अति पुण्य प्रद है इसमें एकादशी के पारण लोप का दोष नहीं होता क्योकि दोनों तिथियों और व्रतो के एक ही देवता श्री विष्णु है

 

“द्वादश्ये एकादशी सौम्य: श्रवणश्च चतुष्टयम्

देव दुन्दुभि योगोऽयं शतमन्यु फलप्रदम”


अर्थात – एकादशी, द्वादशी, बुधवार, और “श्रवण-नक्षत्र”, इन चारों के योग को देव दुन्दुभि नामक योग होता है जसमे व्रत करने से १०० महायोग का फल प्राप्त होता है.

 

एकादशी व्रत में पारण -  अगहन में - "गौमूत्र", पूस में - "गाय का गोबर", माघ में - गाय के "दूध", फाल्गुन में - गाय के "दही", चैत्र में - गाय के "घी", वैशाख में - "कुशोदक", ज्येष्ठ में - "तिल",आषाढ़ में - "यव का चूर्ण", श्रावण में - "दूब",
भाद्रपद में - "कुष्मांड", आश्विन में - "गुड", और कार्तिक में - "बेलपत्र या तुलसी-पत्र" से एकादशी कि पारण होती है.


अष्ट महाद्वादशी -  

1. जिस दिन सूर्योदय काल में एकादशी हो पश्चात द्वादशी के क्षय से अगले सूर्योदय के समय त्रयोदशी आ जाती हो तो इस प्रकार एक अहोरात्र में तीन तिथियो का स्पर्श करने से वह क्षय द्वादशी "त्रिस्पृशा" नाम वाली महा द्वादशी होती है.

 

नारद पुराण में यह निर्वाचन मिलता है कि जिस दिन एकादशी सूर्योदय से पहले अरूणोदय काल में ही निवृत हो गई हो दिन भर द्वादशी हो और रात्रि के अंतिम भाग में त्रयोदशी आ गई हो तो उस दिन त्रिस्पृशा नाम वाली महाद्वादशी होती है.
 
 

2. अरूणोदयकाल में एकादशी तिथि दशमी से अविध हो और एकादशी वृद्धि हो जाय तो उस वृद्ध एकादशी तिथि के दिन "उन्मिलनी" नामक महाद्वादशी होती है. पद्म पुराण में कहा गया है - 

एकादशी तु संपूर्णा वर्द्धते पुनरेव सा।
द्वादशी न च वर्द्धेत कथितोन्मीलिनीति सा॥
संपूर्णैकादशी यत्र द्वादशी च यथा भवेत्।
त्रयोदश्यां मुहुर्त्तार्द्धं वञ्जुली सा हरिप्रिया॥
शुक्ले पक्षेऽथवा कृष्णे यदा भवति वञ्जुली।
एकादशीदिने भुक्त्वा द्वादश्यां कारयेद्व्रतम्॥

3. सुर्योदय काल में दशमी एकादशी तिथि का स्पर्श ना करती हो और द्वादशी कि व्रद्धि हो जाय तो वह वृद्ध द्वादशी "वन्जुली" नाम वाली महा द्वादशी होती है.

4.
पूर्णिमा, अमावस्या तिथि बढ़ जाए तो उस पक्ष कि द्वादशी "पक्षवर्धिनी" नाम वाली होती है.


5. 
शुक्ल पक्ष में द्वादशी तिथि पुष्य नक्षत्र से युक्त हो, तो वह "जया" नामक महाद्वादशी होती है.


6. 
शुक्ल पक्ष में द्वादशी तिथि श्रवण नक्षत्र से युक्त हो, तो वह "विजया" नामक महाद्वादशी होती है.


7. 
शुक्ल पक्ष में द्वादशी तिथि पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त हो, तो वह "जयन्ती" नामक महाद्वादशी होती है.


8. 
शुक्ल पक्ष में द्वादशी तिथि नक्षत्र से युक्त हो, तो वह "पापनाशिनी" नामक महाद्वादशी होती है.


उक्त द्वादाशियो में नक्षत्र योग के साथ बुधवार भी हो तो उस द्वादशी को भी व्रत कर त्रयोदशी में पारण करनी होती है.ऊपर के श्लोक में स्पष्टतः कहा गया है कि शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष को यदि वञ्जुली हो तो एकादशी को भोजन कर द्वादशी का व्रत करें.  जो मनुष्य त्रिस्पृशा महाद्वादशी में उपवास करके भगवान गोविंद का पूजन करता है वह निश्चित ही एक हजार अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करता है.


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2021-04-06 09:57:07 By Pandu vijay

हरे कृष्ण ।

2021-04-04 07:50:05 By Pandu vijay

विवरण किस ग्रन्थ से लिया है

2021-02-07 14:27:44 By Unknwon

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🙏🌷जय श्री राधेगोविंद जी🌷🙏

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