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मुक्ति के प्रकार

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मुक्ति 4 प्रकार की होती है . 1 सामीप्य , 2 सारूप्य , 3 सालोक्य और 4 सायुज्य

1. सामीप्य मुक्ति मेँ भगवान भक्त को अपने पास मेँ स्थान देते हैँ 
.

2. सारूप्य मुक्ति मेँ आत्मा परमात्मा मेँ लीन होता है
. जैसे समुद्र का जल ऊपर जाता है . बरसता है और वह जल नदियोँ के माध्यम से समुद्र मेँ लीन हो जाता है . अर्थात् परमात्मा का एक अंश धराधाम मेँ चौराखी लाख योनियोँ मेँ चक्कर काटते हुए एवं साधन भजन करते हुए अंत मेँ वह अंश परमात्मा मेँ लीन हो गया . अब उस अंश का अस्तित्व नहीँ रहा .

3. सालोक्य मुक्ति मेँ भगवान भक्त को अपने लोक मेँ स्थान देतेँ हैँ 
.

4. सायुज्य मुक्ति मेँ भगवान भक्त को अपने निजी सेवा मेँ रख लेते हैँ 
.

सगुन उपासक मुक्ति की चाहना नहीँ करते इसलिए भगवान उन्हेँ भक्ति का बरदान देते हैँ 
.चारोँ प्रकार की मुक्तियोँ मेँ जनम मरण नहीँ होता परन्तु प्रभु अपनी इच्छा से सारूप्य मुक्ति वालोँ को छोड़कर अन्य को इस धराधाम मेँ जन कल्याण व धर्म प्रचार के लिए भेजते रहते हैँ . ऐसे जीवन मुक्त जीवोँ का कोई भी कर्म न पाप होता है न पुण्य. कर्म बंधन से ये मुक्त रहते हैँ .

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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