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यमलार्जुन का उद्धार

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ऊखल में बंधे हुए भगवान श्यामसुन्दर ने उन दोनों अर्जुन वृक्षों को मुक्ति देने की सोची जो पहले यक्षराज कुबेर के पुत्र थे, इनके नाम थे-नलकूबर और मणि ग्रीव.इनके पास धन, सौंदर्य और ऐश्वर्य की पूर्णता थी और इनकी गिनती रुद्रभगवान के अनुचरो में थी, इससे इनका घमंड बढ़ गया. एक दिन वे दोनों मन्दाकिनी के तट पर कैलाश के रमणीय उपवन में वारुणी मदिरा पीकर मदोन्मत हो गये थे,नशे के कारण उनकी आँखे घूम रही थी,बहुत सी स्त्रियाँ उनके साथ गा बजा रही थी वे उनके साथ विहार कर रहे थे वे जल के भीतर घुस गये और स्त्रियों के साथ जलक्रीड़ा करने लगे.संयोगवश उधर से परम समर्थ देवर्षि नारद जी आ निकले .उन्होंने उन यक्ष-युवको को देखा और समझ गये कि ये इस समय मतवाले हो रहे है नारद जी को देखकर स्त्रियाँ लजा गयी उन्होंने तो अपने-अपने वस्त्र झटपट पहन लिए. परन्तु इन यक्षों ने कपडे नहीं पहने,

 

जब नारद जी ने देखा तो उन पर अनुग्रह करने के लिए शाप देते हुए.यह कहा –जो लोग अपने प्रिय विषयों का सेवन करते है उनकी बुद्धि को सबसे बढ़कर नष्ट करने वाला है श्रीमद-धन-संपत्ति का नशा.वे अपने शरीर को ही सब कुछ मान लेते है उसकी अंत में क्या गति होगी ?उसमे कीड़े पड़ जाएँगे,पक्षी खाकर उसे विष्ठा बना देगे वह जलकर राख कि ढेरी बन जायेंगा.देखो तो सही कितना अनर्थ है की ये कुबेर के पुत्र होकर भी मदोन्मत होकर अचेत हो रहे है इसलिए ये दोनों वृक्षों की योनी में जाने योग्य है मेरी कृपा से इन्हें भगवान की स्मृति बनी रहेगे और सौ वर्ष बिताने पर उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त होगा.वे ही नलकूबर और मणिग्रीव एक ही साथ अर्जुनवृक्ष होकर यमलार्जुन नाम से प्रसिद्ध हुए.और नन्द बाबा के आँगन में लग गये जिनकी जड़े तो एक थी, पर तना दो थे.

 

भगवान ऊखल घसीटते हुए उस ओर जाने लगे जहाँ यमलार्जुन वृक्ष थे.नारदजी की बात को ठीक उसी रूप में पूरा करने के लिए भगवान दोनों वृक्षों के बीच में घुस गये वे तो दूसरी ओर निकल गये परन्तु ऊखल टेढ़ा होकर अटक गया*.दामोदर भगवान श्रीकृष्ण कि कमर में रस्सी कसी हुई थी उन्होंने अपने पीछे लुढ़काते हुए ऊखल को ज्यो ही तनिक जोर से खीचा,त्यों ही पेडो की सारी जड़े उखड गयी दोनों वृक्ष तड़तडाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े.उन दोनों वृक्षों मे से अग्नि के समान तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष निकले उन्होंने भगवान के चरणों के सिर रखकर हाथ जोड़कर शुद्ध हृदय से स्तुति की.श्रीकृष्ण स्तुति करने पर रस्सी से बंधे-बंधे हँसने लगे**अब तुम लोग मेरे परायण होकर अपने-अपने घर जाओ तुम लोगो को संसार चक्र से छुडाने वाले अनन्य भक्ति-भाव की जो तुम्हे अभीष्ट है प्राप्ति हो गयी है तब दोनों परिक्रमा करके चले गये.

 

सार-

 

 *वृक्षों के बीच में जाने का आशय यह है कि भगवान जिनके अन्तर्दश में प्रवेश करते है उसके जीवन में क्लेश का लेश भी नहीं रहता भीतर प्रवेश किये बिना दोनों का उद्धार भी कैसे होता.

 

**जो(ऊखल)भगवान के गुणों से बंधा हुआ है वह त्रिर्यक गति ही क्यों ना हो दूसरों का उद्धार कर सकता है.अपने अनुयायी के द्वारा किया हुआ काम जितना यशस्कर होता है उतना अपने हाथो से नहीं मानो यही सोचकर अपने पीछे-पीछे चलने वाले ऊखल के द्वारा उनका उद्धार करवाया.

 

“ जय जय श्री राधे "


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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