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रास लीला

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प्रथम अध्याय

भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लामल्लिका .

वीक्ष्य रन्तुं मश्रच्क्रे योगमायामुपाश्रित: ..

 

शरद ऋतु थी इसलिए बेला, चमेली, रजनी, जुही, मल्लिका, आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर मँहक रहे थे. प्रकृति के कण-कण में उनकी मँहक समायी हुई थी, पंकज अर्थात कमल सूर्य उदय होने पर खिलते है पर आज बिना सूर्ये के रात में ही खिल रहे है. भगवान के संकल्प करते ही चन्द्रदेव ने पूर्व दिशा के मुखमंडल पर अपने शीतल किरणों रूपी करकमलों से लालिमा की रोली-केसर मल दी.उस दिन चन्द्रदेव का मण्डल अखंड था. उनकी कोमल किरणों से सारा वन अनुराग के रंग में रँग गया था. वन के कोने-कोने में उन्होंने अपनी चाँदनी के द्वारा अमृत का समुद्र उड़ेल दिया था.

 


श्रीकृष्ण ने अपनी वासुरी पर व्रज सुंदरियों के मन को हरण करने वाली काम के बीज मन्त्र “क्लीं” का सप्तम स्वर छेड़ दिया. अचालक प्रकृति में परिवर्तन हो गया, जड़ जितने भी थे मानो सब चेतन हो गये और चेतन सप्तम स्वर सुनते ही जड़ हो गये. ध्वनि पाताल-नभ में पूर गयी. तीनो लोको में खलबली-सी मच गयी.


बाँसुरी भी एक-एक गोपी का नाम ले-लेकर बुला रही है ललिते, विशाखे, वृषभानुजे श्यामसुन्दर ने पहले से ही गोपियों के मन अपने वश में कर रखा था अब तो उनके मन की सारी वस्तुएँ भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा, आदि वृतियाँ भी छीन ली वंशी ध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गयी. वे बड़े वेग से दौडी पड़ी. किसी चीज का ख्याल ही नहीं है क्योकि आज प्रीतम ने आवाहन किया है आज युगों की साधना फलीभूत हुई है .ना कुल का ख्याल है ना तन का संभाल है ना काल का विचार है वे वर्वश होकर चली.

 

किसी संत ने कहा है -


“ वंशी श्रवण, सुनी गोप कुमारी अति आतुर है चलिवे श्याम पे, तन-मन की सब सुध विसरायी. गले को हार,  पहन निज कटी में और कटी की किंकणी, गले में धारी, पग पायल ले धारत कर में,  और कर की पहुँची, पगन में धारी, कान गुलाक,   गाल 
पर बैदी,  नाक में पहनी कान की बाली, वाको एक नैन अंजन बिन सोहे, एक नैन काजल है धारी, कोई भोजन  पति परसत दौडी और कोई जेवत,  कर ग्रास सिधारी,  नारायण जो जैसी हुती वो तैसी ही उठके वन को धाई”..


पति को घास, गाय को रोटी, ऐसी मति बौरायी..”

 

जो गोपियाँ दूध दुह रही थी वे अत्यंत उत्सुकता वश दूध दुहना छोडकर चल पड़ी, जो चूल्हे पर दूध औट रही थी वे उफलता हुआ छोडकर, जो भोजन परस रही थी वे परसना छोडकर, जो छोटे बच्चो को दूध पीला रही थी वे उन्हें छोडकर, जो पति की सेवा शुश्रुषा कर रही थे वे उसे छोडकर, जो स्वयं भोजन कर रही थी वे अपने हाथ में ग्रास लेकर ही दौड पड़ी, वस्त्र, श्रंगार, सब उलट-पलट है. एक आँख में काजल लगा है दूसरे में बिना लगाये ही चल पड़ी, पिता, पति, भाई और बंधुओं किसी के रोके वे ना रुकी.

 

“विकल भई व्रज भोरी ललना, निकसी सदन विसारी,  धरत कहू पग,  परत कहू पग,

  प्रेम की लीला न्यारी उलट-पलट श्रंगार बनाये, पगली भई विचारी” ..

 

कुछ के पति ने उन्हें घर में ही बंद कर दिया तब उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिए और बड़ी तन्मयता से श्रीकृष्ण के ध्यान में बैठ गयी. विरह की तीव्र वेदना से उनके हदय में इतनी व्यथा – इतनी जलन हुई कि उसी क्षण उनमे जो कुछ अशुभ संस्कारो का लेशमात्र अवशेष था वह भस्म हो गया.उस शरीर को छोडकर दिव्य शरीर से श्रीकृष्ण के पास पहुँच गयी.उस शरीर से भोगे जाने वाले कर्मबंधन तो ध्यान के समय ही छिन्न-भिन्न हो चुके थे.

 

वे कही पैर रखती थी, कही पैर पड़ते थे. मुरली रव पर खिची चली जाती है आँखों से रास्ता नहीं देख रही है कानो से रास्ता
देख रही है जहाँ से मुरली की ध्वनि सुनायी दे रही है उसी ओर दौडी जाती है, विहड़ वन है, कंकड, पत्थर कुछ भी नहीं देख रही है. ये सब दिव्य शरीर धारी गोपियाँ श्रीकृष्ण के पास पहुँच गयी और उन्हें चारो ओर से घेरकर खड़ी हो गयी.

 


भगवान ने कहा
महाभाग्यवती गोपियो ! तुम्हारा स्वागत है बताओ सब कुशल-मंगल है न?इस समय यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी. रात का समय है वन में पशु-जंतु घूमते है सब एक ही साथ क्यों आई हो? तुम व्रज लौट जाओ, स्त्रियों का धर्म यही है कि वे पति और कुटुंब की सेवा करे.तुम्हे परपुरुष के पास नहीं होना चाहिये.

 


भगवान की यह निष्ठुरता से भरी बात सुनकर गोपिया उदास हो गयी उन्होंने अपने मुहँ नीचे लटका लिए,और वे रोने लगी.वे जानती है तुमने ही बुलाया है.

 


गोपियों ने कहा
-
तुम सब कुछ जानते हो हम सब कुछ छोडकर केवल तुम्हारे चरणों में ही प्रेम करती है. परिवार-कुटुम्व से, नाता तजकर आयी है उनमे हमें अब कौन अपनाएगा. हे कृष्ण! आप दयानिधि को तज के, हम दुखियों पे दया कौन दर्शायेगा. प्रियतम प्यारे तुम्हारे बिना हमें कौन अधरामृत पान कराएगा? तुम सब धर्मो का रहस्य जानते हो. तात, मात, पति, भ्रात, जगत में यह और नाते है अब उनसे हमारा क्या काज है, हम सबसे त्रण तोड़कर आयी है.

 


और तुम पतिव्रत धर्मो की बात करते हो, सब धर्मो का सार, फल, क्या है ? –ईश्वर की प्राप्ति’ जब हमें फल प्राप्त होने जा रहा है फिर भी हम धर्माचरण में ही रत क्यों रहे? तुम क्यों नीचे की ही बात करते हो और तुम परपुरुष नहीं, ‘परम पुरुष’ हो. हम तन से, मन से तुम्हारी दासी हो गयी है. अब तो तुमको अपनाना ही पड़ेगा.

 


भगवान ने जब गोपियों की व्यथा और व्याकुलता से भरी वाणी सुनी तब उनका हदय दया से भर गया और फिर उन्होंने हँसकर उनके साथ क्रीडा प्रारम्भ की.भगवान ने अपनी भाव-भंगिमा और चेष्टाएँ गोपियों के अनुकूल कर दी. उनकी प्रेमभरी चितवन से और उनके दर्शन के आनंद से गोपियों का मुखकमल प्रफुल्लित हो गया,वे उन्हें चारो ओर से घेरकर खड़ी हो गयी सभी अपने प्रियतम कृष्ण के गुण और लीलाओ का गान करती, प्रेम और सौन्दर्ये के गीत गाने लगी.

 


इसके बाद भगवान गोपियों के साथ यमुना जी के पुलिन पर आये, और रास प्रारंभ किया.काम की ग्यारह क्रियाये- हाथ फैलाना, आलिंगन करना, गोपियों का हाथ दबाना, उनकी चोटी, नीवी आदि का स्पर्श करना, विनोद करना, नखक्षत करना, विनोदपूर्ण चितवन से - देखना और मुस्कराना. इन क्रियाओ से वे गोपियों को आनंदित करने लगे.


जब उदार शिरोमणि सर्वव्यापक भगवान ने इस प्रकार गोपियों का सम्मान किया तब गोपियों के मन में ऐसा भाव आया कि संसार की समस्त स्त्रियों में हम ही सर्वश्रेष्ठ है, हमारे समान और कोई नहीं है, वे कुछ मानवती हो गयी जब भगवान ने देखा कि इन्हें तो अपने सुहाग का कुछ गर्व हो आया है.और अब मान भी करने लगी है.तो उनका मान दूर करने के लिए, भगवान उनके बीच में ही अंतर्धान हो गये .

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2011-12-12 14:55:37 By anil kodand shyam sakha

divya milan jiv or shri krishan ka

2011-10-31 04:11:26 By Sudarshan Dhungel

जय हो बहुत सुन्दर ...श्री राधे जी

2011-10-12 20:43:05 By deepika

prabhu teri lila aparampar hai...........\"krishna tatva meri radhika kishori ki jai ho.......HARE KRISHNA.......\"

2011-10-04 12:52:02 By Ashok Mundotia

।। जय श्री श्याम ।।.

2011-09-22 22:30:37 By Manish Saha

krishna sang radha / radha sang krishna

2011-08-30 19:18:43 By Radha

meri radha ki kon kare hod..... kanuwa to svayam inke charno ka das hai.......

2011-08-13 03:37:21 By Rajender Kumar Mehra

jitni baar padho utna hi anand aat hai...........radhe radhe

2011-08-11 18:32:36 By ARJUN SINGH BHANDARI

SHRI RADHE JI AAPKE MAHIMA NARI HAI JAI SHRI RADHE

2011-07-17 21:05:05 By Rajender Kumar Mehra

bahut sundar vishleshan hai.........radhe radhe

2011-07-15 21:48:56 By Bhakti Rathore

shree radhe teri leela apprmpaar

2011-07-02 21:24:55 By Shivani Goyal

hari bol

2011-05-18 19:05:32 By Rakesh Sharma

जय जय श्री राधे !

2011-04-26 19:50:27 By deepak gupta

sakhi aaj banshi baaji yamuna ke teer

2011-04-24 13:54:45 By shri radhe

♥ ♥ ✿ ♥ shri radhe ♥ ✿ ♥

2011-04-21 20:59:08 By mamta6

SHYAM HAMARE DIL SE PUCHHO, KITNA TUMKO TAAD KIYA, YAAD ME TERI KHATUWALE, JIWAN YUHI GUJAR DIYA.................................... KHATUNARESH KI JAY..................................................hy r

2011-03-10 02:29:18 By shirapthipushkarni

Jai Shree RadheKrshna...!

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