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ललितमाधव और विदग्धमाधव

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आगे का पार्ट-388....

नीलाचल में पँहुच कर रूप गोस्वामी प्रभु के समीप नहीं गये। ये दोनों ही भाई नम्रता की सजीव मूर्ति ही थे, यवनों के संसर्ग में रहने के कारण ये अपने को अत्यन्त ही नीच समझते थे और यहां तक कि मन्दिर में घुसकर दर्शन भी नहीं करते थे, दूर से ही जगन्नाथ जी की ध्वजा को प्रणाम कर लेते थे। इसलिये रूप जी महात्मा हरिदास जी के स्थान पर जाकर ठहरे।

हरिदास जी तो जाति के यवन थे, किन्तु गौर भक्त उनका चतुर्वेदी ब्राह्मणों से भी अधिक सम्मान करते थे, वे भी जगन्नाथ जी के मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिस रास्ते से मन्दिर के पुजारी और सेवक जाते थे, उस रास्ते से भी कभी नहीं निकलते थे। प्रभु नित्य प्रति समुद्र स्नान करके हरिदास जी के स्थान पर आते थे। दूसरे दिन जब प्रभु नित्य की भाँति हरिदास जी के आश्रम पर आये, तब श्री रूप जी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के पाद पद्मों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु की दृष्टि ऊपर की ओर थी।


हरिदास जी ने धीरे से कहा, - प्रभो रूप जी प्रणाम कर रहे हैं।


रूप का नाम सुनते ही चौंककर प्रभु ने कहा, हैं क्या कहा? रूप आए हैं क्या? यह कहते कहते प्रभु ने उनका आलिंगन किया और उन्हें वहीं रहने की आज्ञा दी। इसके अनन्तर प्रभु ने सभी गौडिय तथा पुरी के भक्तों के साथ श्री रूप का परिचय करा दिया।


श्री रामानंद राय और सार्वभौम महाशय दोनों ही कवि थे। रूप जी का परिचय पाकर ये दोनों ही परम संतुष्ट हुये और प्रभु से इनकी कविता सुनने के लिए प्रार्थना करने लगे।


एक दिन प्रभु राय रामानंद जी, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर तथा अन्यान्य भक्तों को साथ लेकर हरिदास जी के निवास स्थान पर श्री रूप जी के नाटकों को सुनने के लिए आये।

सबके बैठ जाने पर प्रभु ने रूप जी से कहा, - रूप ! तुम अपने नाटकों को इन लोगों को सुनाओ। ये सभी काव्य मर्मज्ञ, रसज्ञ और कवि हैं।


इतना सुनते ही रूप जी लज्जा के कारण पृथ्वी की ओर ताकने लगे। उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकला,

तब प्रभु ने बडे ही स्नेह के साथ कहा, - वाह जी, यह अच्छी रही। हम यहां तुम्हारी कविता सुनने आये है, तुम शर्माते हो। शरम की कौन सी बात है? कविता का फल तो यह है कि वह रसिकों के सामने सुनाई जाय। हाँ, सुनाओ, संकोच मत करो। देखो, ये राय बडे भारी रस मर्मज्ञ हैं। इन्हें तो हम पकड लाये हैं।

राय ने कहा, हाँ जी, सुनाईये। इस प्रकार शरमाने से काम न चलेगा। पहले तो अपने नाटक का नाम बताइए, फिर विषय बताइये, तब उसके कहीं कहीं के स्थलों को पढकर सुनाइये। इस पर भी रूप चुप ही रहे।

तब प्रभु स्वयं कहने लगे, - इन्होंने ललितमाधव और विदग्धमाधव ये दो नाटक लिखे हैं। विदग्धमाधव में तो भगवान् की ब्रज की लीलाओं का वर्णन है और ललितमाधव में द्वारिका पुरी की लीलाओं का। इससे ही सुनिये। इनके रथ के सम्मुख नृत्य करते समय जो मेरे भावों को समझकर श्लोक बनाया था, उसे तो मैंने आप लोगों को सुना ही दिया, अब इनके नाटक में से कुछ सुनिये।

राय ने कुछ प्रेम पूर्वक भर्त्सना के स्वर में कहा, क्यों जी, सुनाते क्यों नहीं? देखो प्रभु भी कह रहे हैं। प्रभु की आज्ञा नहीं मानते ? हां, पहले विदग्धमाधव का मंगलाचरण सुनाइये। नान्दी के मुख से भगवान् की वन्दना में जो प्रारंभ में श्लोक कहा गया है उसे ही सुनाइये।

इतना सुनते ही लजाते हुये श्री रूप जी धीरे-धीरे विदग्धमाधव का मंगलाचरण पढने लगे,। श्लोक को सुनते ही सभी एक स्वर में वाह...! वाह करने लगे।

श्री रूप जी का लज्जा के कारण मुख लाल पड गया, वे नीचे की ओर देख रहे थे।

इस पर राय ने कहा, रूप जी ! आप तो बहुत अधिक संकोच करते हैं। इसीलिए, लीजिये मैं आपके काव्य की प्रशंसा ही नहीं करता। अच्छा तो यह भगवान् की वन्दना हुई। अब भगवत् स्वरूप जो गुरूदेव हैं जो कि प्राणियों के एकमात्र भजनीय और इष्ट हैं, भगवत् वन्दना के अनन्तर उनकी वन्दना में जो कुछ कहा है, उसे और सुनाइये।

क्रमशः ....

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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