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रूप गोस्वामी अंतिम समय तक वृन्दावन में ही रहे

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आगे का पार्ट_389.....


यह सुनकर श्री रूप जी और भी अधिक सिकुड़ गये। महाप्रभु के सम्मुख उन्हीं के सम्बन्ध का श्लोक पढने में उन्हें बडी घबराहट सी होने लगी। किन्तु फिर भी राय महाशय के आग्रह से रूक रूककर ये लजाते हुये पढने लगे-


इसे सुनते ही प्रभु कहने लगे, भगवान् जाने इन कवियों को राजा लोग दण्ड क्यों नहीं देते। किसी की प्रशंसा करने लगते हैं, तो आकाश पाताल एक कर देते हैं। इनसे बढकर झूठा और कौन होगा? इस श्लोक में तो अतिशयोक्ति की हद कर डाली है।


महाप्रभु जी ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि ये उन्हीं के सम्बन्धित श्लोक था।


राय ने कहा,, प्रभो ! इसे तो हम ही समझ सकते हैं, यथार्थ वर्णन तो इसी श्लोक में किया गया है। ऐसे स्वाभाविक गुण पूर्ण श्लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते। इतना कहकर राय ने विदग्धमाधव के अन्य भी बहुत से स्थलों को सुना और सुनकर उनके काव्य की हृदय से भूरि भूरि प्रशंसा की।

विदग्धमाधव को सुन लेने पर राय रामानंद जी कहने लगे, अपने दूसरे नाटक ललित माधव की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्तों को चखा दीजिये। हाँ उसका भी पहले मँगलाचरण का श्लोक सुनाइये।


यह सुनकर श्री रूप जी फिर उसी लहजे के साथ श्लोक पढने लगे।


धन्य है, धन्य है और साधु साधु की ध्वनि समाप्त होने पर राय महाशय ने कहा, - श्री भगवान् की स्तुति के अनन्तर इष्टस्वरूप श्री गुरूदेव की स्तुति में जो श्लोक हो उसे सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्तों को अत्यन्त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये।


प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढने लगे।


इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्वर में कहने लगे, रूप ने और सम्पूर्ण काव्य तो बहुत ही सुंदर बनाया। इनका एक एक श्लोक अमूल्य रत्न के समान है, किंतु जाने क्या समझकर इन्होंने ये दो एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्लोक मणियों में काँच के टुकड़ों के समान मिला दिये हैं?


इस पर भक्तों ने एक स्वर में कहा, हमें तो यही श्लोक सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हुआ। बात को यहीं समाप्त करने के लिए राय महाशय ने कहा, अच्छा छोडिये इस प्रसंग को। आगे काव्य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ रूप जी ! इस नाटक के भी भावपूर्ण अच्छे अच्छे स्थल पढकर सुनाइये।


इतना सुनते ही श्री रूप जी नाटक के अन्यान्य स्थलों को बडे स्वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण
काव्य की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्त में प्रभु रूप जी का प्रेम से आलिंगन करके भक्तों को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये।


इस प्रकार भक्तों के साथ रथयात्रा और चातुर्मास के सभी त्योहारों तथा पर्वों को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्वार के दशहरे के बाद भक्तों को गौड के लिये विदा किया।


नित्यानंद जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुनः आग्रह किया, किन्तु उन्होंने प्रभु प्रेम के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। सभी भक्त गौड देश को लौट गये।

श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास रहे। अन्त में कुछ समय के पश्चात प्रभु ने उन्हें वृन्दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड देश होते हुए वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुये। यही इनकी प्रभु से अंतिम भेंट थी। यहां से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्ण कीर्तन करते हुये निवास करते रहे। ब्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी ब्रज से बाहर नहीं गये। प्रभु ने जाते समय इनका प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और भक्तिविषयक ग्रन्थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की।

रूप गोस्वामी प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्ण के गुणगान में ही अपना संपूर्ण समय बिताया। गौड में इनकी कुछ धन सम्पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्हें गौड भी जाना था, इसलिए ये प्रभु से विदा होकर गौड देश को ही गये और वहां इन्हें लगभग एक वर्ष धन सम्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त ठहरना पडा।

क्रमशः ....

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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