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रूप, सनातन प्रभु के चरणों में गिरकर जोरों से रोने लगे

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आगे का पार्ट-333


निरन्तर साधु संग तथा शास्त्र चिन्तन से रूप तथा सनातन को अपने अपार वैभव से वैराग्य होने लगा। इनका मन किसी को आत्मसमर्पण करने के लिए अत्यन्त ही व्याकुल होने लगा। अब इनकी प्रवृत्ति धीरे-धीरे कर्म की ओर होने लगी। उसी समय इन लोगों ने महाप्रभु की प्रशंसा सुनी। उस समय महाप्रभु का भगवन्नाम संकीर्तन एक नयी ही वस्तु थी। अब तक लोगों की ऐसी धारणा थी कि जो समाज के बंधनों को परित्याग कर देने के कारण एक बार समाज से पतित हो गया, वह सदा के लिए ही पतित बन गया। फिर उसके उद्धार का कोई उपाय नहीं है। महाप्रभु ने इस मान्यता का जोरों से खण्डन किया। वे इस बात पर जोर देने लगे-


चाहे कितना भी बडा पापी क्यों न रहा हो, जो अनन्य भाव से भगवान् का भजन करता है वह परम साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि अब उसने उत्तम निश्चय कर लिया। भगवान् में जिसका मन लग गया है वह फिर पापी रह ही कैसे सकता है। एक बार प्रसन्न होकर प्रभु की शरण में जाने से ही संपूर्ण पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। भगवन्नाम के प्रभाव से घोर घोर पापी से पापी भी प्रभु के पाद पद्मों तक पहुंच सकते हैं।


प्रभु के ऐसे उदार और सर्वभूतहितकारी भावों को सुनकर इन लोगों को भी अपने पूर्व जीवन पर पश्चाताप होने लगा और गौडेश्वर से छिपकर इन्होंने एक पत्र प्रभु के लिए नवद्वीप भेजा। उसमें इन्होंने अपनी पतितावस्था का वर्णन करके अपने उद्धार का उपाय जानना चाहा। प्रभु ने इनके पत्र के उत्तर में एक श्लोक लिखकर इनके पास भेज दिया। श्लोक का अर्थ-


अर्थात पर पुरूष से सम्बन्ध रखने वाली व्यभिचारिणी स्त्री बाहर से घर के कार्यो में व्यस्त रहकर भी भीतर ही भीतर उस नूतन संगमरूपी रसायन का ही आस्वादन करती रहती है इसी प्रकार बाहर से तो तुम राजकाजों को भले ही करते रहो, किन्तु हृदय से सदा उन्हीं हृदय रमण के साथ क्रीडा विहार करते रहो।


प्रभु के ऐसे अनुपम उपदेशों को पाकर इन लोगों की प्रभु दर्शन की लालसा और भी अधिक बढने लगी। जब इन्होंने सुना कि प्रभु तो संन्यास लेकर पुरी चले गये हैं, तब तो ये और भी अधिक व्याकुल हुये। हुसैनशाह इन्हें बहुत अधिक मानता था और इनके ऊपर पूर्ण विश्वास रखता था। उन दिनों कई राज्यों से युद्ध छिडा हुआ था, ऐसी दशा में पुरी जा ही नहीं सकते। जब वृन्दावन जाने की इच्छा से प्रभु स्वयं ही राम केलि में पधारे तब तो इनके आनन्द की सीमा नहीं रही। ये मन ही मन प्रभु की भक्त वत्सलता की प्रशंसा करने लगे। सब लोगों के समक्ष ये लोग प्रभु से स्पष्ट तो मिल नहीं सकते थे इसलिए एकान्त में प्रभु के दर्शनों की बात सोचने लगे।


जब सभी लोग सो गये और सम्पूर्ण नगर में सन्नाटा छा गया तब अर्धरात्रि के समय ये अपने प्यारे के संग सुख की इच्छा से साधारण वेष में चलें।


उस समय अत्यन्त ही दीन होकर ये लोग प्रभु के निवास स्थान पर पहुंचे। उस समय सभी भक्त मार्ग के परिश्रम से थककर घोर निद्रा में पडे सो रहे थे। इन्होंने सबसे पहले नित्यानंद जी तथा हरिदास जी को जगाया और अपना परिचय दिया। इन दोनों भाइयों का परिचय पाकर नित्यानंद जी परम प्रसन्न हुये और उन्होंने धीरे से जाकर प्रभु को जगाया और दोनों भाइयों के आने का संवाद दिया। प्रभु ने उसी समय दोनों को अपने समीप बुलाने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा पाकर पुलकित शरीर से अत्यन्त दीनता के साथ ये लोग प्रभु के समीप पंहुचे और जाते ही व्याकुलता के साथ प्रभु के चरणों में गिरकर जोरों से रूदन करने लगे।

प्रभु अपने कोमल करो से बार बार इन्हें उठाते थे, किन्तु वे प्रेम के कारण प्रभु के पाद पद्मों को छोडना ही नहीं चाहते थे। अत्यन्त ही करूणा के स्वर में ये प्रभु से अपने उद्धार की प्रार्थना करने लगे।

प्रभु ने इन्हें आश्वासन देते हुए कहा, - तुम लोगों के रूदन से मेरा हृदय फटता है, तुम दोनों ही परम भागवत हो और मेरे जन्म जन्मान्तर के सुह्रद हो। मैं तुम्हारे दर्शनों के लिए व्याकुल था। राम केलि में आने का मेरा और दूसरा कोई अभिप्राय नहीं था, यहाँ तो मैं केवल तुम दोनों भाईयों के दर्शनों के लिए आया हूं। आज से तुम्हारा नूतन जन्म हुआ। अब इन मुसलमानी नामों को त्याग दो, आज से तुम्हारे नाम रूप और सनातन हुये।


प्रभु के इस प्रेम पूर्ण वचनों से दोनों भाइयों को परम संतोष हुआ और वे भाँति भाँति से प्रभु की स्तुति करने लगे।

अन्त में सनातन ने प्रभु से कहा, - प्रभो ! इस युद्ध काल में और इतनी भीड भाड़ के साथ वृन्दावन यात्रा करना ठीक नहीं है। वृन्दावन तो अकेले ही जाना चाहिए। रास्ते में इन सबका प्रबंध करना, देख रेख करना और सबकी चिन्ता का भार उठाना ठीक नहीं है। इस समय आप लौट जायें और फिर अकेले कभी वृन्दावन की यात्रा करें। प्रभु ने सनातन के सत्परामर्श को स्वीकार कर दिया और प्रातःकाल उन दोनों भाइयों को प्रेम पूर्वक आलिंगन करके विदा किया और आप सभी भक्तों के साथ कन्हाई की नाटशाला होते हुए फिर शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर ठहर गये।


क्रमशः

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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