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सर्वश्रेष्ठ संपत्तिशाली पुरूष कौन है?

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एक दिन प्रभु ने राय महाशय से कुछ अत्यन्त ही रहस्यमय गूढ प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर राय ने भगवत् प्रेरणा से जैसा मन में उठा वैसा यथातथ्य दिया।

प्रभु ने पूछा,-  राय महाशय ! मुझे सम्पूर्ण विद्याओं में श्रेष्ठ पराविद्या बताइये, जिससे बढकर दूसरी कोई विद्या ही न हो।


राय ने कुछ लज्जित भाव से कहा, प्रभो ! मैं क्या बताऊँ, श्री कृष्ण भक्ति के अतिरिक्त और सर्वोत्तम विद्या हो ही कौन सकती है? उसी के लिए परिश्रम करना सार्थक है, शेष सभी व्यर्थ है।


प्रभु ने पूछा, सर्वश्रेष्ठ कीर्ति कौन सी कही जा सकती है?


राय ने कहा, प्रभो ! श्री कृष्ण के संबंध से लोगों में परिचय होना यही सर्वोत्तम कीर्ति है.।


प्रभु ने पूछा, अच्छा अच्छा ऐसी सर्वश्रेष्ठ कौन सी है जिसके सामने सभी संपत्तियां तुच्छ समझी जा सकें?


राय ने उत्तर दिया, श्री निकुंज विहारी राधावल्लभ की अविरल भक्ति जिसके हृदय में विद्यमान है वही सम्पत्तिशाली पुरूष है। उसकी समता का पुरूष त्रिभुवन में कोई नहीं हो सकता।


प्रभु ने पूछा, मुझे यह बताइये कि सबसे बडा दुख कौन सा है?


रूँधे हुये कण्ठ से अश्रु विमोचन करते हुए राय महाशय ने कहा, प्रभो ! जिस क्षण श्री हरि का हृदय में स्मरण न रहे, जिस समय विषय भोगों की बातें सूझने लगें, वही सबसे बडा दुःख है। इसके अतिरिक्त भगवद्भक्तों से वियोग होना भी एक दारुण दुख है।


प्रभु ने पूछा, आप मुक्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ किसे समझते हैं ?

 

राय ने कहा, प्रभो ! जिसकी ! सम्पूर्ण चेष्टाएं श्री कृष्ण की प्रेम प्राप्ति के ही निमित्त हों, जो सतत श्री कृष्ण के ही मधुर नामों का उच्चारण करता हुआ उन्हें ही पाने का प्रयत्न करता है, वही सर्वश्रेष्ठ मुक्त पुरूष है।


प्रभु ने पूछा, आप किस गान को सर्वश्रेष्ठ गान समझते हैं?


राय ने कहा, श्री कृष्ण के मधुर नामों का कीर्तन स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ गान है।


श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे।

हे नाथ नारायण वासुदेव।।


प्रभु ने पूछा - आप जीवों के कल्याण के निमित्त सर्वश्रेष्ठ कार्य किसे समझते हैं?


राय ने कहा, प्रभो ! महत्पुरूषों के पाद पद्मों की पावन पराग से अपने मस्तक को अलंकृत बनाये रहना और उनके मुख निःसृत अमृत वचनों का कर्णरन्ध्रों से निरंतर पान करते रहना, इसे ही मैं जीवों के कल्याण का मुख्य हेतु समझता हूँ।


प्रभु ने पूछा, प्राणीमात्र के लिए सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय क्या वस्तु है?


राय ने कहा, श्री कृष्ण का सुमधुर नाम, ही सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय वस्तु है


श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे।

हे नाथ नारायण वासुदेव।।


बस यही सर्वश्रेष्ठ स्मरणीय है। प्रभु ने पूछा, आप ध्यानों में सर्वश्रेष्ठ ध्यान किसे समझते हैं?


राय ने कहा, श्री वृन्दावनविहारी की बाँकी झाँकी का ही निरन्तर ध्यान बना रहे, बस यही सर्वश्रेष्ठ ध्यान है।


प्रभु ने पूछा, आप जीवों के लिये ऐसा सर्वोत्तम निवास स्थान कौन सा समझते हैं जहाँ सर्वस्व के मुख में धूलि देकर निवास किया जाये?


राय ने कहा, प्रभो !


सरबसु के मुख धरि दै सरबसु कै ब्रज धूरि,


बस, सब कुछ छोडकर वृन्दावन वास करना ही जीव का अंतिम निवास स्थान है। वृन्दावन परित्याग करके एक पैर भी कहीं अन्यत्र न जाना चाहिए।


वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।


बस राधा मुरलीधर का ध्यान करते रहना चाहिए और वृन्दावन को न छोडना चाहिए।


प्रभु ने पूछा, आप श्रवणों में सर्वश्रेष्ठ श्रवणीय क्या समझते हैं?


राय ने कहा-

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे।
हे नाथ नारायण वासुदेव।।


यह संपूर्ण श्रवणों का सार है। जिसने इसे यथावत् रीति सुन लिया फिर उसके लिये कुछ श्रवण करना शेष नहीं रह जाता।


क्रमशः ......


 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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