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साक्षी गोपाल का प्रकट होना

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प्रातःकाल उठकर प्रभु नित्यकर्म से निवृत्त हुये और भगवान् श्री गोपीनाथ की मंगल आरती के दर्शन करके उन्होंने भक्तों के सहित आगे के लिये प्रस्थान किया। रास्ते में उन्हें वैतरणी नदी मिली। उसमें स्नान करके प्रभु राजपुर में पँहुचे। वहाँ वराहभगवान् का स्थान है। वराह भगवान् के दर्शन करने के अनन्तर याजपुर में होते हुये और शिवलिंग, विरजादर्शन तथा ब्रह्मकुण्ड में स्नान करते हुए नाभि गया में पँहुचे। वहाँ दशाश्वमेध घाट पर स्नान करके कण्टक नगर में पँहुचकर भगवान् साक्षिगोपाल के दर्शन किये। साक्षी गोपाल जी के मंदिर में बहुत देर तक कृष्ण कीर्तन होता रहा।

नगर के बहुत से नर नारी प्रभु के प्रभु के कीर्तन और नृत्य को देखने के लिये एकत्रित हो गये। प्रभु को नृत्य करते देखकर ग्रामवासी स्त्री पुरूष भी आनंद में उन्मत्त होकर कठपुतलियों की तरह नाचने कूदने लगे। बहुत देर तक संकीर्तन आनंद होता रहा। तब प्रभु ने अपने भक्तों के सहित साक्षीगोपाल के मन्दिर में विश्राम किया।

 

रात्रि में भक्तों के साथ कथोपकथन करते करते प्रभु ने नित्यानंद जी से पूछा,-  श्री पाद ! आपने तो प्रायः भारतवर्ष के सभी मुख्य मुख्य तीर्थों में भ्रमण किया है। आपसे तो संभवतया कोई प्रसिद्ध तीर्थ न बचा हो, जहां जाकर आपने दर्शन स्नानादि न किया हो?


प्रभु ने पूछा - यहाँ भी पहले आये थे?


नित्यानंद जी ने उत्तर दिया पुरी से लौटते हुये मैने साक्षीगोपाल के दर्शन किये थे।

प्रभु ने कहा,-  तीर्थ में जाकर उस तीर्थ का माहात्म्य अवश्य सुनना चाहिये। आप मुझे साक्षीगोपाल का महात्म्य सुनाईये। इनका नाम साक्षिगोपाल क्यों पडा? इन्होंने किसकी साक्षी दी थी?


प्रभु की ऐसी आज्ञा सुनकर धीरे-धीरे नित्यानंद जी कहने लगे, मैने किसी पुराण में तो साक्षिगोपाल भगवान् की ये कथा नहीं सुनी, क्योकि यह बहुत प्राचीन तीर्थ नहीं है। अभी थोडे ही दिन से साक्षीगोपाल भगवान् विद्यानगर से यहाँ पधारे हैं। लोगों के मुख से मैनें जिस प्रकार साक्षीगोपाल की कथा सुनी है, उसे सुनाता हूं।


तैलंग देश में गोदावरी नदी के तट पर विद्यानगर नाम की कोट देश की प्राचीन राजधानी थी। वह नगर बडा ही समृद्धिशाली तथा समुद्र के समीप होने के कारण वाणिज्य व्यापार का केन्द्र था। उसी नगर में एक समृद्धिशाली कुलीन ब्राह्मण रहता था। ब्राह्मण भगवत् भक्त था वह गौ, ब्राह्मण और देव प्रतिमाओं में भक्ति रखता था। घर में खाने पीने की कमी नहीं थी। लडके बडे हो गये थे, इसलिए घर के सम्पूर्ण कामों को वे ही करते थे। यह वृद्ध ब्राह्मण तो माला लेकर भजन किया करता था। घर में पुत्र, पुत्रवधू स्त्री तथा एक अविवाहित छोटी कन्या थी ब्राह्मण की इच्छा तीर्थ यात्रा करने की हुई।

उस वृद्ध ब्राह्मण के समीप ही एक गरीब ब्राह्मण का लडका रहता था। उसके माता-पिता उसे छोटा ही छोडकर परलोक वासी हो गये थे। जिस किसी प्रकार मेहनत मजूरी करके वह अपना निर्वाह करता था। किन्तु उसके हृदय में भगवान् के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी। वह एकान्त में सदा भगवान् का भजन किया करता था। इस कारण उस पर भगवान् की कृपा थी।


एक दिन उस वृद्ध ब्राह्मण ने इस युवक से कहा,-  भाई! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो चलो तीर्थ यात्रा कर आवें। गृहस्थी के जंजाल से कुछ दिन के लिए तो छूट जायें।


प्रसन्नता प्रकट करते हुए उस युवक ने कहा, - इससे बढकर उत्तम बात और हो ही क्या सकती है? मैं आपके साथ चलने के लिये तैयार हूं।


क्रमशः ……


 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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