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राय रामानंद को महाप्रभु में राधाकृष्ण का दर्शन

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प्रभु ने पूछा- आप उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ उपासना किसे समझते हैं?


राय ने कहा, युगल सरकार के सिवा और उपासना की ही किसकी जा सकती है। असल में तो वृन्दावनविहारी ही परम उपास्य हैं।
शक्ति से वे पृथक हो ही नहीं सकते।


प्रभु ने पूछा,
आप भक्ति और मुक्ति में किसे अधिक पसन्द करते है?


राय ने कहा, प्रभो ! मुक्ति के नीरस फल को कोई विचारप्रधान दार्शनिक पुरूष ही पसन्द करेगा। मुझे तो प्रभु के पाद पद्मों में निरंतर लोट लगाते रहना ही सबसे अधिक पसंद है। मैं अमृत के सागर में जाकर अमृत बनना नहीं चाहता। मैं तो उसके समीप बैठकर उसकी मधुरिमा के रसास्वादन करने को ही सर्वश्रेष्ठ समझता हूं।


इस प्रकार के प्रश्नोत्तरी में ही वह रात शेष हो गई और दोनों फिर एक दूसरे से पृथक हो गये।


राय महाशय का अनुराग प्रभु के पाद पद्मों में उत्तरोत्तर बढता ही जाता था, वे उनमें साक्षात् श्री कृष्ण के रूप का अनुभव करने लगे। उनके नेत्रों के सामने से प्रभु का वह प्राकृत रूप एकदम ओझल हो गया और वे अपने इष्टदेव श्री राधा कृष्ण के स्वरूप का दर्शन करने लगे।

इसीलिए उन्होंने एक दिन प्रभु से पूछा, प्रभो ! मैं आपके श्री विग्रह में अपने इष्टदेव के दर्शन करता हूँ। मुझे भान होने लगा है कि आप साक्षात् श्री हरि ही हैं लोगों को भ्रम में डालने के लिए आपने छद्म वेष धारण कर लिया है।


हँसते हुए प्रभु ने उत्तर दिया, राय महाशय ! आपको भी मेरे शरीर में अपने इष्टदेव के दर्शन न होंगे तो और किसे होंगे? आपकी दृष्टि में तो जितने संसार के दृश्य पदार्थ हैं सब के सब इष्टमय ही होने चाहिए। श्री मद्भागवत में लिखा है कि सर्वश्रेष्ठ भगवद्भक्त संपूर्ण चराचर प्राणियों में भगवान् के ही दर्शन करता है, उसकी दृष्टि में भगवान् से पृथक कोई वस्तु है ही नहीं। आप सर्वश्रेष्ठ भागवतोत्तम है, फिर आपको मेरे शरीर में अपने इष्टदेव के दर्शन होते हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?


प्रभु के ऐसे उत्तर को सुनकर राय कहने लगे, प्रभो आप मेरी प्रवंचना न कीजिए। मुझे अपने यथार्थ रूप के दर्शन दीजिये। मुझे शूद्राधम समझकर अपने यथार्थ स्वरूप से वँचित न कीजिए। यह कहते कहते राय महाशय प्रेम के आवेश में आकर मूर्छित होकर प्रभु के पैरों पर गिर पडे। उसी समय उन्हें प्रभु के शरीर में श्री राधा और कृष्ण के सम्मिलित दर्शन हुए। प्रभु के शरीर में उस अद्भुत रूप के दर्शन करके राय महाशय ने अपने को कृतकृत्य समझा और वे अपने भाग्य की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे।


सावधान होने पर प्रभु ने राय रामानंद जी का दृढ आलिंगन किया और उनसे कहने लगे, - राय महाशय ! मेरे ये दस दिन आपके साथ श्री कृष्ण कथा सुनते सुनते बहुत ही आनन्दपूर्वक व्यतीत हुये। इतना अपूर्व रस पहले मुझे कभी प्राप्त नहीं हुआ था।


आपकी कृपा से इस अत्यन्त ही दुर्लभ प्रेम रस का मैं यह किंचित् रसास्वादन कर सका। अब मेरी इच्छा है कि आप शीघ्र ही इस राज काज को छोडकर पुरी आ जाइये। वहां हम दोनों साथ रहकर निरन्तर इस आनन्द रस का पान करते रहेंगे, आपकी संगति से मेरा भी कल्याण हो जायेगा।


हाथ जोडे हुये अत्यन्त ही विनीत भाव से राय रामानंद ने कहा, प्रभो ! यह तो सब आपके ही हाथ में है। जब इस भव जंजाल से छुडाकर अपने चरणों की शरण प्रदान करेंगे, तभी चरणों के समीप रहने का सुयोग प्राप्त हो सकेगा। मेरे सामर्थ्य के बाहर की बात है। आप ही अनुग्रह करके मुझे ऐसा धन्य जीवन दान कर सकते हैं।


प्रभु ने कहा, अच्छा अब जाइये।


दक्षिण से लौटकर एक बार मैं आपसे फिर मिलूंगा। तभी आप मेरे साथ पुरी चलियेगा।


प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके राय रामानंद जी अपने स्थान को चले गए और प्रभु ने भी प्रातःकाल आगे की यात्रा का विचार किया।

क्रमशः 

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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