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मैं प्रतिज्ञा करता हूँ प्रभु ईश्वर हैं, ईश्वर हैं

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सार्वभौम से महाप्रभु का फिर से संस्कार कराने की बात सुनकर दुख प्रकट करते हुए आचार्य ने कहा,-  आपकी बुद्धि तो निरन्तर शास्त्रों में शंका करते-करते शंकित सी बन गयी है। आपकी दृष्टि में घट पट आदि बाह्य वस्तुओं के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। ये साक्षात् भगवान् हैं, इन्हें बाह्य उपकरणों की आवश्यकता की क्या अपेक्षा? ये तो स्वयं सिद्ध त्यागी, संन्यासी, वैरागी और प्रेमी हैं, इन्हें आपकी सिफारिश की आवश्यकता न पडेगी।


सार्वभौम ने कहा, आपकी ये ही भावुकता की बातें तो अच्छी नहीं लगती। हम तो उन बेचारों के हित की बातें कह रहे हैं। अभी उनकी नयी अवस्था है। संसारी सुखों से अभी एकदम वंचित से हो रहे हैं। ऐसी अवस्था में ये संन्यास धर्म के कठोर नियमों का पालन कैसे कर सकेंगे?


आचार्य ने कहा, ये नियमों के भी नियामक हैं। इनका सन्यास ही क्या? यह तो लोक शिक्षा के निमित्त इन्होनें ऐसा किया है।


हँसते हुए सार्वभौम ने कहा, यह खूब रही, युवावस्था में इन्हें यह लोक शिक्षा की खूब सूझी। महाराज ! आप कहीं लोक शिक्षा के निमित्त ऐसा मत कर डालना।


आचार्य ने कहा, लोक शिक्षा मनुष्य कर ही क्या सकता है, यह तो भगवान् का ही कार्य है और वे ही विविध वेष धारण करके लोक शिक्षण का कार्य किया करते है।


जोरों से हँसते हुए सार्वभौम ने कहा, बाबा ! दया करो उस बेचारे संन्यासी को आकाश पर चढाकर उसके सर्वनाश की बातें क्यों सोच रहे हो? पुराने लोगों ने ठीक ही कहा है, आचार्य में उडने की शक्ति नहीं होती, पीछे से शिष्य गण ही उसके पंख लगाकर उन्हें आकाश में उडा देते हैं, मालूम पडता है, आचार्य आप इस युवक संन्यासी के अभी से पर लगाना चाहते हैं। आपकी दृष्टि में ये ईश्वर हैं?


आवेश के साथ गोपीनाथाचार्य ने कहा, - हां ईश्वर हैं, ईश्वर हैं, ईश्वर हैं। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ये साधारण जीव नहीं हैं।


आचार्य की आवेश पूर्ण बातों को सुनकर सार्वभौम के आसपास में बैठे हुए सभी शिष्य एकदम चौंक से पडे।सार्वभौम भी कुछ विस्मित से होकर आचार्य के मुख की ओर देखने लगे।

थोडी देर के पश्चात् हँसते हुए सार्वभौम ने कहा, - मुँह आपके घर का है, जीभ उधार लेने किसी के पास जाना नहीं पडता, जो आपके मन में आवे वह अनाप शनाप बकते रहें किन्तु आपने तो शास्त्रों का अध्ययन किया है, भगवान् के अवतार तीनों ही युगों में होते हैं। कलिकाल में इस प्रकार के अवतारों की बात कहीं भी नहीं सुनी जाती। फिर अवतार तो गिने गिनाये हैं। उनमें तो हमने ऐसा अवतार कहीं नहीं सुना। वैसे तो जीवमात्र को ही भगवान् का अंश होने से अवतार कहा जा सकता है।


श्रीमद्भागवत के श्लोक के अनुसार असंख्य अवतार भी माने जा सकते हैं और ये आवश्यकता पडने पर सब युगों में उत्पन्न हो सकते हैं, किन्तु उनकी गणना अंशांश अवतारों में भी की गयी है जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा है।


इस दृष्टि से आप इन संन्यासी को अवतार कहते हैं, तो हमें कोई आपत्ति नहीं, किन्तु ये ही साक्षात् सनातन परब्रह्म हैं, सो कैसे हो सकता है? भगवान् श्रीकृष्ण ही सनातन पूर्ण ब्रह्म हैं, उनका अवतार युगों में नहीं होता, कल्पों में भी नहीं होता, कभी सैंकड़ों हजारों युगों के पश्चात् वे अवतीर्ण होते हैं। इसलिए आप कोरी भावुकता की बातें कर रहें हैं।


गोपीनाथाचार्य ने कहा, मालूम पडता है, बहुत शास्त्रों की आलोचना करने से शास्त्रों के वाक्यों को आप भूल गये हैं। आप जानते हैं, नित्य अवतार के लिए कोई नियम नहीं। उनका रहस्य शास्त्र क्या समझ सकें? यह तो शास्त्रातीत विषय है, नित्य अवतार का कभी तिरोभाव नहीं होता, वह तो एकरस होकर सदा संसार में व्याप्त रहता है। किसी भाग्यवान को ही गुरू रूप में प्राप्त होते हैं और जिसपर उनका अनुग्रह होता है, वही उनका कृपापात्र बन सकता है।


हँसते हुये सार्वभौम ने कहा ये नित्यावतार कौन सी नयी वस्तु निकल आयी?


आचार्य ने कुछ गुस्से के स्वर में कहा, आपको तो समझाना इसी प्रकार है जैसे ऊसर भूमि में बीज बोना। परिश्रम तो व्यर्थ जाता ही है, साथ ही बीज का भी नाश होता है।


कुछ विनोद के स्वर में सार्वभौम ने कहा - उपजाऊ भूमि के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ और उनसे प्रार्थना करता हूँ कि हमारे ऊपर भी कृपा करें। आप आपे से बाहर क्यूँ हुये जातें है, हमें समझाईये।


क्रमशः ……


 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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