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पितृ गृह मेरे लिए सचमुच कारावास बना हुआ है

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आगे का पार्ट-336


पिता के मोह में पगे हुए इन वचनों को सुनकर आँखों में आँसू भरे हुए रघुनाथदास जी ने कहा,-  पिताजी मैं क्या करूं, न जाने क्यों मेरा संसारी कामों में एकदम चित्त ही नहीं लगता। मैं बहुत चाहता हूँ कि मेरे कारण आपको किसी प्रकार का कष्ट न हो, किन्तु मैं अपने वश में नहीं हूँ। कोई बलात् मेरे मन को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आपकी आज्ञा शिरोधार्य करता हूँ, मैं शीघ्र ही लौट आऊंगा।


पुत्र के ऐसे आश्वासन देने पर गोवर्धनदास ने अपने पुत्र के लिए एक सुन्दर सी पालकी मँगायी। दस बीस विश्वासी नौकर उनके साथ दिये और बडे ठाठ बाट के साथ राजकुमार की भांति बहुत सी भेंट की सामग्री के साथ प्रभु के दर्शनों के लिए भेजा।

जहाँ से शान्तिपुर दीखने लगा, वहीं से ये पालकी पर से उतर गये और नंगे पाँवो ही धूप में चलकर प्रभु के समीप पंहुचे। दूर से ही भूमि पर लोटकर इन्होंने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु ने जल्दी से उठकर इन्हें छाती से चिपटा लिया और धीरे-धीरे इनके काले घुँघराले बालों को अपनी उँगलियों से सुलझाने लगे। प्रभु ने इनका माथा सूँघा और अपनी गोदी में बिठाकर बालकों की भाँति पूछने लगे। तुम इतनी धूप में अकेले कैसे आये, क्या पैदल आये हो? साथ में नौकर नहीं लाये। तुम्हारा मुख एकदम सूखा है, इसका क्या कारण है?

रघुनाथदास जी ने इन प्रश्नों में से किसी का कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वे अपने अश्रुजल से प्रभु के काषाय वस्त्रों को भिगो रहे थे। इतने में ही रघुनाथदास जी के साथी सेवकों ने प्रभु के चरणों में आकर साष्टांग प्रणाम किया और भेंट की सभी सामग्री प्रभु के सम्मुख रख दी। महाप्रभु धीरे-धीरे रघुनाथदास जी के स्वर्ण समान कांतियुक्त शरीर पर अपना प्रेममय, सुखमय और ममत्वमय कोमल कर फिरा रहे थे।


प्रभु की ऐसी असीम कृपा पाकर रोते रोते रघुनाथदास कहने लगे, - प्रभो,! पितृ गृह मेरे लिए सचमुच कारावास बना हुआ है। मेरे ऊपर सदा पहरा रहता है, बिना पूछे मैं कहीं आ जा नहीं सकता, स्वतन्त्रता से घूम फिर नहीं सकता। हे जग के त्राता ! मेरे इस गृहबन्धन को छिन्न भिन्न कर दीजिये। मुझे यातना से छुडाकर अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिए। आपके चरणों का चिन्तन करता हुआ ही अपने जीवन को व्यतीत करूँ, ऐसा आशीर्वाद दीजिए।


प्रभु ने प्रेमपूर्वक कहा, रघुनाथ ! तुम पागल तो नहीं हो गये हो, अरे ! घर भी कहीं बन्धन हो सकता है? उसमें से अपनापन निकाल दो, बस फिर रह ही क्या जाता है। जब तक ममत्व है, तभी तक दुख है। जहां ममत्व दूर हुआ कि सब अपना ही अपना है। आसक्ति छोडकर व्यवहार करो। धन, स्त्री तथा कुटुम्बियों में अपनेपन के भाव को भुलाकर व्यवहार करो।


क्रमशः

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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