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नृत्य, के साथ नगर संकीर्तन

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सब लोगों के यथा योग्य खडे हो जाने पर प्रभु ने नूपुर बजाकर इशारा किया। बस, प्रभु का संकेत पाना था कि खोल करतालों की मधुर ध्वनि से आकाश गूँजने लगा। प्रेम वारूणी में पागल बने हुए भक्त ताल स्वर के सहित गा गा कर नृत्य करने लगे। उस समय किसी को न तो अपने शरीर की सुधि रही और न बाह्य जगत का ही ज्ञान रहा। जिस प्रकार भूत पिशाच से पकडे जाने वाले मनुष्य होश हवास भुलाकर नाचने लगते हैं, उसी प्रकार भक्त गण प्रेम में विभोर होकर नृत्य करने लगे, किंतु कोई भी ताल स्वर के विपरीत नहीं जाता था।

इतने भारी कोलाहल में भी सभी ताल स्वर के नियमों का भली भांति पालन कर रहे थे। सभी के पैर एक साथ ही उठते थे। घुँघरूओ की रुनझुन रूनझुन ध्वनि के साथ खोल करताल और झाँझ मजीरों की आवाजें मिलकर विचित्र प्रकार की स्वर लहरी की सृष्टि कर रहीं थीं।

एक सम्प्रदाय दूसरे संप्रदाय से बिलकुल पृथक ही पदों का गायन करता था। वाद्य (ढोलक मृदंग बगैरह) बजाने वाले भक्त नृत्य करते करते वाद्य बजा रहे थे। खोल बजाने वाले बजाते बजाते दोहरे हो जाते और पृथ्वी पर लेट लेट कर खोल बजाने लगते। करताल बजाने वाले चारों ओर हाथ फेंक फेंक कर जोरों से करताल बजाते। झांझ और मजीरा की मीठी-मीठी ध्वनि सभी के हृदयों में खलबली सी उत्पन्न कर रही थी। नृत्य करने वाले को चारों ओर से घेरकर भक्त खडे हो जाते और वह स्वच्छंद रीति से अनेक प्रकार के कीर्तन के भावों को दर्शाता हुआ नृत्य करने लगता। उसके सम्प्रदाय के सभी भक्त उसके पैरो के साथ पैर उठाते और उसकी नूपुर ध्वनि के सहित अपनी नूपुर ध्वनि को मिला देते। बीच-बीच में सम्पूर्ण लोग एक साथ बोल उठते-


हरि बोल, हरि बोल, गौर हरि बोल।


अपार भीड़ में से उठी हुई यह आकाश मण्डल को कँपा देने वाली ध्वनि बहुत देर तक अन्तरिक्ष में गूँजती रहती।


भक्त फिर उसी प्रकार संकीर्तन में मग्न हो जाते। सबसे पीछे नित्यानंद और गदाधर के साथ प्रभु नृत्य कर रहे थे। महाप्रभु का आज का नृत्य देखने ही योग्य था। मानो आकाश मण्डल में देवगण अपने-अपने विमानों में बैठे हुए प्रभु का नृत्य देख रहे हों। प्रभु उस समय भावावेश में आकर नृत्य कर रहे थे। घुटनों तक लटकी हुई उनकी मनोहर माला पृथ्वी को स्पर्श करने लगती। कमर को लचाकर, हाथों को उठाकर, उर्ध्व दृष्टि किये हुए प्रभु नृत्य कर रहे थे। उनके दोनों कमल नयनों से प्रेमाश्रु बह बहकर कपोंलो पर कढी हुई पत्रावली के ऊपर लुढ़क रहे थे। तिरछी आँखों की कोरों में से शीतल अश्रुओं के कण बह बहकर जब कपोंलो के ऊपर कढी हुई पत्रावली के ऊपर होकर नीचे गिरते। तब उस समय के मुख मंडल की शोभा देखते ही बनती थी। वे गद्गद कण्ठ से गा रहे थे।


तुम्हार चरणे मन लागुरे, हे सारंगधर, सारंगधर।


कहते कहते प्रभु का गला भर आता। और सभी भक्त एक स्वर में बोल उठते हरि बोल, हरि बोल, गौर हरि बोल।


प्रभु फिर सँभल जाते और फिर उसी प्रकार कोकिल कण्ठ से गान करने लगते। वे हाथ फैलाकर, कमर लचाकर, भौहें मरोड़कर, सिर को नीचा ऊँचा करके भांति भांति से अलौकिक भावों को प्रदर्शित करते।। सभी दर्शक काठ की पुतलियों के समान प्रभु के मुख की ओर देखते के देखते ही रह जाते। प्रभु के आज के नृत्य से कठोर से कठोर हृदय में भी प्रेम का संचार होने लगा। कीर्तन के महाविरोधियों के मुखों में से भी हठात् निकल पड़ने लगा, धन्य है प्रेम हो तो ऐसा हो। कोई कहता इतनी तन्मयता तो मनुष्य शरीर में सम्भव नहीं। दूसरा बोल उठता, निमाई तो साक्षात् नारायण हैं। कोई कहता हमने तो आज तक ऐसा सुख अपने जीवन में कभी पाया नहीं। दूसरा जल्दी से बोल उठता, तुमने क्या, किसी ने भी ऐसा सुख आज तक कभी नहीं पाया। यह सुख तो देवताओं को भी दुर्लभ है। वे भी इसके लिए सदा लालायित बने रहते हैं।


बोलो गौर हरि, बोलो गौर हरि


क्रमशः 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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