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क्यों की श्रीकृष्ण ने राधारानी जी से उनके महाभाव की याचना ?

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                         नवद्वीपे अवतार,राधाभाव अंगीकार,भाव कांति अंगेर् भूषण.

अर्थ - व्रज राज नंदन श्री कृष्ण चैतन्य रूप से नवद्वीप में अवतार ग्रहण किया. उन्होंने श्री राधा के भाव तथा कांति को अपने अंगों का भूषण किया है और कृष्ण से गौर हुए हैं. 


                        तीन वाञ्छा अभिलाषी,शची गर्भे प्रकाशी, संगे सब पार्षद गण

अर्थ - अपनी तीन वांछायो को पूर्ण करने की अभिलाषा से वे शचि माता के गर्भ से आविरभूत हुए हैं. उनके साथ उनके समस्त पार्षद गण भी अवतीर्ण हुए हैं.


                               गौर हरि अवतरि,प्रेमेर बादर करि,साधिला मनेर निज काज.

अर्थ - श्री गौर हरि ने अवतार लेकर प्रेम को तो मेघ बना दिया-प्रेम की सब स्थानों पर निर्विचार वर्षा कर दी.इधर अपनी भी मनोभिलाषा को पूर्ण किया.

                        राधिकार प्राण पति, की भाबे कांदिया निति, इहा बूझे भकत समाज

अर्थ- श्री राधिका के प्राण पति श्री कृष्णचैतन्य रूप में प्रेम विभोर होकर किस तरह नित रोये-यह तो गौरभक्त समाज ही जानता है.


(श्रील नरोत्तम दास ठाकुर विरचित प्रेम भक्ति चंद्रिका)


इस त्रिपदी में श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय ने प्रेम पुरुषोत्तम श्रीश्री कृष्ण चैतन्य स्वरूप का संक्षिप्त परिचय दिया है.व्रज लीला में निखिल रस-निर्यास आस्वादन करने के बाद भी ब्रजेन्द्र नंदन श्री कृष्ण की 3 वांछाये पूर्ण न हो सकीं-

1) श्री राधा प्रेम की महिमा क्या है?


2) श्री राधा अपने महाभाव से मेरे जिस रूप-सौंदर्य का आस्वादन करती हैं, उसका माधुर्य कैसा है?


3) उस मेरे माधुर्य आस्वादन में जो सुख श्री राधाजी अनुभव करती हैं, वह सुख कैसा है?


इन तीन बातों को जानने के लिए श्री कृष्ण व्रजलीला में सक्षम न हो सके.क्योंकि इनको जानने के लिए श्री राधाजी के मादनाख्य-महाभाव का आश्रय होना आवश्यक.व्रजलीला में श्री कृष्ण उसके विषय हैं. इन वांछायो की पूर्ति के लिए उन्होंने श्री राधाजी से उनके महाभाव की याचना की.

श्री राधाजी का तो कृष्ण-वाञ्छा पूर्ति करना स्वरूप-धर्म है.उन्होंने प्राणपति को अपना मादनाख्य महाभाव प्रदान किया. क्योंकि श्री राधाजी का भाव एवं देह पृथक नही हैं, महाभाव से गठित महाभाव स्वरूपिणी हैं वे.भाव के प्रदान में उनकी अंगकान्ति भी श्री श्यामसुन्दर को सहज में प्राप्त हो गई.श्यामसुन्दर से वे श्री गौरसुन्दर बन गए.

जैसा की श्री रूप गोस्वामी पाद ने कहा- राधा-भावद्युति-सुवलितं नौमी कृष्णस्वरूपम...श्री कृष्ण ही राधा-भाव-द्युति से सुवलित होकर श्री चैतन्य रूप में आविरभूत हुए. इस रूप में उन्होंने अपनी तीन वांछाये पूर्ण की. श्री राधाप्रेम की महिमा का अनुभव किया. राधाभाव से अपनी रूप-माधुरी एवं प्रेम-माधुरी का आस्वादन किया, तथा उससे उद्भूत परमानंद का भी अनुभव किया.


इसके अलावा उन्होंने कलि के युगधर्म श्रीनाम संकीर्तन का भी स्वयम आस्वादन-आचरण करते हुए जीव जगत में प्रचार किया.तथा नाम प्रेम को बिना किसी विचार के आचाण्डाल वितरण किया,जैसे मेघ बिना विचार के सब स्थानों पर जल बरसाता है.


श्री गौरभक्तों ने श्रीकृष्ण चैतन्य के नाम संकीर्तन में उनके स्वेद,कम्प,पुलक,अश्रु आदि प्रेम के सात्विक विकारों को अपने नेत्रों से देखा है. उनके कृष्ण विरह में क्रन्दन को सुनकर पाषाण भी विगलित हो जाते थे.

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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