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ये महाभागवत कौन हैं ?

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आगे .....


गौडिय भक्तों के आगमन का संवाद सुनकर महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर और गोविन्द को चंदन माला लेकर भक्तों के स्वागत के निमित्त पहले ही भेज दिया था। उन लोगों ने जाकर भक्ताग्रणी श्री अद्वैताचार्य का सबसे पहले स्वागत किया। पहले श्री स्वरूप दामोदर ने आचार्य के गले में माला पहनाई और फिर गोविन्द ने भी श्रद्धा पूर्वक आचार्य को माला पहना कर उनकी चरण वंदना की।

आचार्य ने गोविंद को पहले कभी नहीं देखा था, इसलिये वे स्वरूप गोस्वामी से पूछने लगे, - स्वरूप गोस्वामी ! ये महाभाग भक्त कौन हैं, इन्हें तो मैंने पहले कभी नहीं देखा। क्या ये पुरी के ही कोई भक्त हैं?


स्वरूप गोस्वामी ने कहा, नहीं, ये पुरी के नहीं हैं। श्री ईश्वरपुरी महाराज के सेवक है, जब वे सिद्धि प्राप्त करने लगे तो उन्होंने इसे प्रभु की सेवा में रहने की आज्ञा दी थी। उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके ये प्रभु के समीप आ गये और सदा उनकी सेवा में लगे रहते हैं। इनका नाम गोविन्द है। बडे ही विनयी, सुशील और सरल हैं। गोविन्द का परिचय पाकर आचार्य ने उनका आलिंगन किया और सभी को साथ लेकर वे सिंहद्वार की ओर चलने लगे।


महाराज प्रतापरूद्र जी ने आचार्य गोपीनाथ से भक्तों का परिचय कराने के लिए कहा। आचार्य सभी भक्तों का परिचय कराने लगे। वे अँगुली के संकेत से बताने लगे, जिन्होंने इन तेजस्वी वृद्ध को माला पहनाई है, ये महाप्रभु के दूसरे स्वरूप श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी हैं, इनके साथ यह महाप्रभु के सेवक गोविंद हैं। ये आगे आगे जो उत्साह के साथ जो नृत्य कर रहे हैं, ये परम भागवत अद्वैताचार्य हैं इनके पीछे जो ये चार गौर वर्ण के सुन्दर से पण्डित हैं, वे श्री वास, वक्रेश्वर, विद्यानिधि और गदाधर हैं। ये चन्द्रशेखर आचार्य हैं। महाप्रभु के पूर्वाश्रम के ये मौसा होते हैं। महाप्रभु के चरणों में इनका दृढ अनुराग है।

इस प्रकार एक करके आचार्य सभी भक्तों परिचय कराने लगे। भक्तों का परिचय पाकर महाराज को बडी प्रसन्नता हुई। उसी समय उन्होंने देखा, गौडिय भक्त श्री मन्दिर की ओर न जाकर प्रभु के वास स्थान की ओर जा रहे हैं और भवानन्द के पुत्र वाणीनाथ बहुत प्रसाद लिये जल्दी जल्दी भक्तों से पहले प्रभु के पास पँहुचने का प्रयत्न कर रहे हैं।

यह देखकर महाराज ने पूछा, - आचार्य महाशय ! इन लोगों का प्रभु के प्रति कितना अधिक स्नेह है। बिना प्रभु को साथ लिये ये लोग अकेले भगवान् के दर्शन के लिए भी नहीं जाते हैं। हां ये वाणी नाथ ! इतना प्रसाद क्यों लिये जा रहे हैं?


आचार्य ने कहा, - 
महाप्रभु प्रसाद द्वारा स्वयं इन सबका स्वागत करेंगे।


महाराज ने कहा, तीर्थ में आकर सबसे प्रथम क्षौर और उपवास का विधान है, क्या उसे ये लोग न करेंगे?


आचार्य ने कहा, - करेंगे क्यों नहीं, किन्तु प्रभु के प्रेम के कारण उनका सबसे पहले क्षौर ही हो तब प्रसाद पावें ऐसा आग्रह नहीं है। महाप्रभु के हाथ के प्रसाद से ये लोग अपना उपवास भंग नहीं समझते।


महाराज ने कहा, आप ठीक कहते हैं, प्रेम में नेम नहीं होता।


इतना कहकर महाराज अट्टालिका से नीचे उतर आये और मन्दिर के प्रबन्धक से बहुत सा प्रसाद जल्दी से प्रभु के पास पँहुचाने के लिये कहा।


उन लोगों ने तो पहले से ही सब प्रबन्ध कर रखा था। महाराज की आज्ञा पाते ही उन्होंने और भी प्रसाद पंहुचा दिया।

क्रमशः ...



 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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