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ये जन्मसिद्ध पुरूष हैं

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आगे का पार्ट-335


धीरे-धीरे रघुनाथ जी बडे हुए। उनके मन को इतना अतुल वैभव अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। विषय भोग उन्हें काटने के लिए दौडने लगे और उनका मन मधुप अप्राकृतिक सजे हुए परम रमणीक उद्यान को छोडकर खुले हुए वनों में स्वच्छंदभाव से विचरण करने के निमित्त व्याकुल होने लगा। जिन सोने चाँदी के ठीकरों को लोग सर्वस्व समझकर लोग बुरे से बुरे कामों को करने में भी आगा पीछा नहीं करते और उनकी प्राप्ति के निमित्त प्राणों की बाजी लगाने में कभी संकोच नहीं करते, उन्हीं स्वर्ण के सिक्कों को रघुनाथ जी अपने पथ के कण्टक समझते थे। उनका मन राज काज में बिल्कुल नहीं लगता था, वे तो परमार्थ पथ को परिष्कृत करने वाले सत्संग के लिए तड़पते रहते थे।


परिवार वालों को इनका यह व्यवहार अरूचिकर प्रतीत होता था, वे इन्हें भाँति भाँति के संसारी प्रलोभन देते थे, अनेक, अनेक प्रकार की भोग्य सामग्रियों द्वारा इनके मन को उनमें फँसाना चाहते थे, किन्तु उनके सभी प्रयत्न निष्फल हुये। जो मधुरातिमधुर मिश्री का आस्वादन कर रहा है, उसे गुड देकर अपने वश में करना मूर्खता ही है।

सभी को इनकी ऐसी दशा पर चिन्ता हुई। उस समय महाप्रभु संन्यास लेकर शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर ठहरे हुए थे, अपने पिता की आज्ञा लेकर ये उस समय महाप्रभु के दर्शन करने को गये थे और चार पाँच दिन प्रभु के चरणों के समीप रह भी गये थे। महाप्रभु तो पूरे पारखी थे, वे इनके रंग ढंग से ही ताड़ गये कि यह जन्म सिद्ध पुरूष है। संसार में चिरकाल तक संसारी बनकर नहीं रह सकता। फिर भी प्रभु ने इन्हें समझा बुझाकर अनासक्त भाव से गृहस्थी में रहकर संसारी काम करते रहने का उपदेश करके घर लौटा दिया।


पिता ने जब देखा कि पुत्र का चित्त संसारी कामों में नहीं लगता तब उन्होंने एक सुन्दरी कन्या से इनका विवाह कर दिया। गोवर्धन दास धनी थे, राजा और प्रजा दोनों के प्रीति भाजन थे, सभी लोग उन्हें प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखते थे। राजाओं के समान उनका वैभव था। इसलिए उन्हें अपने पुत्र के लिए सुन्दर से सुन्दर पत्नी खोजने में कठिनता नहीं हुई।

उनका ख्याल था कि रघुनाथ की युवावस्था है, वह परम सुन्दरी पत्नी पाकर अपनी सारी उदासीनता को भूल जायेगा और उसके प्रेमपाश में बंधकर संसारी हो जायेगा, किन्तु विषय भोगों को ही सर्वस्व समझने वाले पिता को क्या पता था कि इसकी शादी तो किसी दूसरे के साथ पहले ही हो चुकी है, उसके सौन्दर्य के सामने इन संसारी सुन्दरियों तुच्छातितुच्छ है। पिता का यह भी प्रयत्न विफल ही हुआ। परम सुन्दरी पत्नी रघुनाथ जी को अपने प्रेमपाश में नहीं फँसा सकी। रघुनाथ दास उसी प्रकार संसार से उदासीन ही बने रहे।


अब जब रघुनाथ जी ने सुना कि प्रभु वृन्दावन नहीं जा सके हैं, वे रामकेलि से लौटकर अद्वैताचार्य के घर ठहरे हुए हैं तब तो इन्होंने बडी ही नम्रता के साथ अपने पूज्य पिता जी के चरणों में प्रार्थना की कि मुझे महाप्रभु के दर्शनों की आज्ञा मिलनी चाहिए। महाप्रभु के दर्शन करके मैं शीघ्र ही लौट आऊंगा।


इस बात को सुनते ही गोवर्धन दास किंकर्तव्यविमूढ हो गये, किन्तु वे अपने बराबर के युवक पुत्र को जबरदस्ती रोकना भी नहीं चाहते थे, इसलिए आँखों में आँसू भरकर उन्होंने कहा - बेटा ! हमारे कुल का तो तू ही एकमात्र दीपक है। हम सभी लोगों को एकमात्र तेरा ही सहारा है। तू ही हमारे जीवन का आधार है। तुझे देखे बिना हम जीवित नहीं रह सकते। मैं महाप्रभु के दर्शनों से तुझे रोकना नहीं चाहता,, किन्तु इस बूढे की यही प्रार्थना है कि तू मेरे इन सफेद बालों की ओर देखकर जल्दी से लौट आना, कहीं घर छोड़कर बाहर जाने का निश्चय मत करना।

क्रमशः....

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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