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हरिदास जी के प्रति ईर्ष्या

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क्रमशः से आगे .....


विश्वास के सामने सभी कुछ संभव है। विश्वास के सहारे ही चरणामृत मानकर मीरा विषपान कर गयी, नामदेव ने पत्थर की मूर्ति को भोजन कराया। धन्ना भगत का बिना बोया ही खेत उपज आया और रैदास जी ने भगवान् की मूर्ति को सजीव करके दिखला दिया। ये सब भक्तों के दृढ विश्वास के ही चमत्कार है।

जिनकी भगवान्नाम पर दृढ़ निष्ठा है, उन्हें भारी से भारी विपत्ति भी साधारण सी घटना ही मालूम पड़ने लगती है। वे भयंकर से भयंकर विपत्ति में भी अपने विश्वास से विचलित नहीं होते। ध्रुव तथा प्रह्लाद लोक प्रसिद्ध चरित्र इसके प्रमाण हैं, ये चरित्र तो बहुत प्राचीन हैं, किन्तु महात्मा हरिदास की नाम निष्ठा का ज्वलंत प्रमाण तो अभी कल ही परसों का है।

जिन लोगों ने प्रत्यक्ष में उनका संसर्ग और सहवास किया था तथा जिन्होंने अपनी आंखों से उनकी भयंकर यातनाओं का दृश्य देखा था, उन्होंने स्वयं इनका चरित्र लिखा है। ऐसी भयंकर यातनाओं को क्या कोई साधारण मनुष्य सह सकता है ? कभी नहीं, जब तक ह्रदय में दृढ विश्वास जन्य भारी बल न हो, तब तक ऐसी दृढ़ता संभव ही नहीं हो सकती।


बेनापोल की निर्जन कुटिया में वारवनिता का उद्धार करके और उसे अपनी कुटिया में रखकर महात्मा हरिदास शान्तिपुर में आकर अद्वैताचार्य जी के सत्संग में रहने लगे। शान्तिपुर के समीप ही फुलिया नाम के ग्राम में एकान्त समझकर वहीं इन्होंने अपनी एक छोटी सी कुटिया बना ली। और उसी में भगवान्नाम का अहर्निश कीर्तन करते हुए निवास करने लगे।

उस समय सम्पूर्ण देश में मुसलमानों का प्राबल्य था। स्थान-स्थान पर इस्लाम धर्म के प्रचार के निमित्त काजी नियुक्त थे, वे जिसे भी इस्लाम धर्म के प्रचार में विघ्न समझते, उसे ही बादशाह से भारी दण्ड दिलाते। शासन सत्ता पर पूरा प्रभाव होने के कारण काजी उस समय के बादशाह ही समझे जाते थे। फुलिया के आसपास में गोराई नाम का एक काजी भी इसी काम के लिए नियुक्त था। उसने जब हरिदास जी का इतना प्रभाव देखा तब तो उसकी ईष्या का ठिकाना नहीं रहा।

वह सोचने लगा, हरिदास के इतने बढते प्रभाव को यदि रोका न जायेगा तो इस्लाम धर्म को बडा भारी धक्का पहुंचेगा। हरिदास जाति के मुसलमान हैं। मुसलमान होकर वह हिन्दुओं का प्रचार करता है वह काफिर है इसलिए काफिर को कत्ल करने से भी सबाब होता है। दूसरे लोग भी इसकी देखा-देखी ऐसा ही काम करेंगे। इसलिए इसे दरबार से सजा दिलानी चाहिए। यह सोचकर गोराई काजी ने इनके विरूद्ध राजदरबार में अभियोग चलाया। राजाज्ञा से हरिदास जी गिरफ्तार किये गये और मुलूकपति के यहाँ इनका मुकदमा पेश हुआ।


मुलूकपति इनके प्रभाव और तेज को देखकर चकित रह गया। उसने इन्हें बैठने के लिये आसन दिया। हरिदास जी के बैठ जाने पर मुलूकपति ने दया का भाव दर्शाते हुये अपने स्वाभाविक धार्मिक विश्वास के अनुसार कहा - भाई तुम्हारा जन्म मुसलमान के घर हुआ है। यह भगवान् की तुम्हारे ऊपर अत्यंत ही कृपा है। मुसलमान के घर जन्म लेकर भी तुम काफिरों के से आचरण क्यों करते हो ? इससे तुमको मुक्ति नहीं मिलेगी। मुक्ति का साधन तो वही है जो इस्लाम धर्म की पुस्तक कुरान में बताया गया है। हमें तुम्हारे ऊपर बड़ी दया आ रही है, हम तुम्हें दण्ड देना नहीं चाहते। अब भी तोबा (अपने पाप का प्रायश्चित) कर और कलमा पढकर मुहम्मद साहब की शरण में आ जाओ ! भगवान् तुम्हारे सभी अपराधों को क्षमा कर देंगे और तुम भी मोक्ष के अधिकारी बन जाओगे।


क्रमशः .....

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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