Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Yatra
Shanka
Health
Pandit Ji

प्रभु के पीछे-पीछे हजारों भक्त आँसू बहाते हुए चल रहे थे

  Views : 477   Rating : 0.0   Voted : 0
Rate Article

आगे.....


दक्षिण यात्रा समाप्त करने के अनन्तर महाप्रभु को नीलाचल में रहते हुये चार वर्ष हो गये। वृन्दावन जाने के लिए प्रभु प्रतिवर्ष सोचते थे, किंतु रथयात्रा के पश्चात् भक्त कहते चातुर्मास में यात्रा निषेध है, वे कार्तिक आने पर दिवाली करके जाने को कहते। फिर जाडा आ जाता, जाडा समाप्त होने पर कहते, बडी गर्मी है, पश्चिम में तो और भी अधिक है, अब कहां जाइयेगा। इस प्रकार आजकल करते करते ही चार वर्ष व्यतीत हो गये। महाप्रभु राय रामानंद जी तथा साktर्वभौम भट्टाचार्य आदि भक्तों के प्रेम पाश में इस प्रकार जकड़ कर बंधे हुए थे कि वे स्वेच्छा से जाने में समर्थ होने पर भी इन लोगों की सम्मति लिए बिना जाना नहीं चाहते थे।

भक्तों ने जब देखा कि अबकी बार प्रभु वृन्दावन जाने के लिये तुले ही हुये हैं, तो उन्होंने विवशता पूर्वक अपनी स्वीकृति दे दी। अबके गौडिय भक्त रथयात्रा करके ही लौट गये थे,  सदा की भाँति उन्होंने चातुर्मास पुरी में नहीं किया था। प्रभु ने उनसे कह दिया था कि तुम चलो हम भी पीछे से आयेंगे। इसी आनन्द में भक्त प्रसन्नता पूर्वक चले गये थे।


वर्षा काल समाप्त हो गया। क्वार का महीना आ गया। विजयादशमी के दिन महाप्रभु ने गौड होते हुये वृन्दावन जाने का निश्चय किया। प्रातःकाल उठकर वे नित्यकर्म से निवृत्त हुये। समुद्र स्नान करके प्रभु लौटे भी नहीं थे कि इतने में ही भक्तों की भीड़ लगनी आरंभ हो गयी। धीरे-धीरे सभी मुख्य मुख्य भक्त महाप्रभु के स्थान पर एकत्रित हुए। महाप्रभु सभी भक्तों को साथ लेकर श्री जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए चले।

मन्दिर में पँहुचकर प्रभु ने भगवान् से आज्ञा माँगी, उसी समय पुजारी ने माला और प्रसाद लाकर प्रभु को दिया। भगवान् की प्रसादी, माला और महाप्रसादान्न पाकर प्रभु अत्यन्त ही संतुष्ट हुये और इसे ही भगवान् की आज्ञा समझकर मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुये वे कटक की ओर चल लगे।

प्रभु के पीछे-पीछे सैंकड़ों गौड देशीय तथा उडिया भक्त आँसू बहाते हुए चल रहे थे। महाप्रभु उनसे बार बार लौटने के लिए कहते, उनसे आग्रह करते, चलते-चलते खडे हो जाते और सबको प्रेमपूर्वक आलिंगन करते हुए कहते, - बस अब हो गया। आप लोग अपने-अपने घरों को लौट जायें। पुरूषोत्तम भगवान् की कृपा होगी तो मैं शीघ्र ही लौटकर आपलोगों के दर्शन करूँगा। इस प्रकार प्रभु भाँति भाँति से उन्हें समझाते, किन्तु कोई पीछे लौटता ही नहीं था, लौटना तो अलग रहा, पीछे की ओर देखने में भी भक्तों का हृदय फटता था, वे प्रभु के वियोगजन्य दुःख का स्मरण आते ही जोरों से रूदन करने लगते। इस प्रकार भक्तों से आग्रह करते करते ही प्रभु भवानीपुर आ पँहुचे।

महाप्रभु ने अब आगे और चलना उचित नहीं समझा, अतः यहीं रात्रि में निवास करने का निश्चय किया। इतने में ही पालकी पर चढकर राय रामानंद जी भी प्रभु की सेवा में आ पँहुचे। उनके छोटे भाई वाणीनाथ जी भी भगवान् का बहुत सा प्रसाद कई आदमियों से साथ लिवाकर भवानीपुर आ उपस्थित हुए। महाप्रभु जी ने अपने हाथों से जगन्नाथ जी का महाप्रसाद सभी भक्तों को आग्रह पूर्वक खूब ही खिलाया और आपने भी भक्तों की प्रसन्नता के निमित्त साथ ही प्रसाद पाया। रात्रि भर सभी ने वहीं विश्राम किया।


महाप्रभु के अत्यन्त आग्रह से कुछ तो पुरी को लौट गये, किन्तु बहुत से प्रभु के साथ ही चलने को तुले हुए थे। उनमें मुकुंद, गोविन्द दत्त, गदाधर, दामोदर पण्डित, वक्रेश्वर, स्वरूप गोस्वामी, गोविन्द, चंद्रेश्वर, सार्वभौम भट्टाचार्य तथा राय रामानंद आदि मुख्य थे। महाप्रभु इन सबके साथ भुवनेश्वर आये और वहां से दर्शन करके कटक पँहुचे। वहाँ पर सभी ने गोपाल भगवान् के दर्शन किये और सभी मिलकर संकीर्तन करने लगे। इसी समय स्वप्नेश्वर नामक एक ब्राह्मण ने प्रभु का निमंत्रण किया, महाप्रभु उसका निमन्त्रण स्वीकार करके उसके यहाँ भिक्षा करने गए। शेष सभी भक्तों को राय रामानंद जी ने भोजन कराया।

क्रमशः

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
Enter comments


 
चैतन्य जीवनामृत
Last Viewed Articles
eBook Collection
सभी किताबे
राधा संग्रह
ग्रन्थ
कृष्ण संग्रह
व्रज संग्रह
व्रत कथाएँ
यात्रा
DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
Copyright © radhakripa.in>, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here.