Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Yatra
Shanka
Health
Pandit Ji

सार्वभौम के घर भिक्षा

  Views : 507   Rating : 0.0   Voted : 0
Rate Article

आगे.....


गौडिय भक्तों के चले जाने के अनन्तर सार्वभौम भट्टाचार्य ने प्रभु के समीप आकर निवेदन किया,- प्रभो अब तक तो मैनें भक्तों के कारण कहने में संकोच किया, किन्तु अब तो भक्त चले गये। अब मैं एक प्रार्थना करना चाहता हूँ, उसे आपको स्वीकार करना होगा। प्रभु ने कुछ प्रेमपूर्वक व्यंग करते हुये कहा, सब बातों को पहले ही स्वीकार करा लिया करें, तब बताया करें यह भी कोई बात हुई, बताईये क्या बात है, जो मानने योग्य होगी तो मान लूँगा और न मानने योग्य होगी तो न कर दूँगा।


भट्टाचार्य ने कहा, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है मानने ही योग्य है।


प्रभु ने जल्दी से कहा, - जब पहले से ही मालूम है कि बात मानने योग्य है, तब सन्देह ही क्यों किया? अच्छा, खैर सुनूँ भी तो कौन सी बात है?


कुछ सोचते-सोचते धीरे-धीरे भट्टाचार्य सार्वभौम ने कहा, मेरी भी इच्छा है और षाठी (भट्टाचार्य की छोटी पुत्री) की माता भी बहुत दिनों से पीछे पडी है कि प्रभु को कुछ काल तक निरंतर ही अपने घर लाकर भिक्षा करायी जाये। आप अधिक दिनों तो हमारी भिक्षा स्वीकार ही क्यों करेंगे, किन्तु कम से कम एक मास पर्यन्त तो अपनी चरण धूलि से हमारे नये घर को पवित्र बनाईये ही। यही मेरी प्रार्थना है।


प्रभु ने जोरों से हँसते हुए कहा - आप तो कहते थे, मानने योग्य बात है। इस बात को भला कोई संन्यासी स्वीकार कर सकता है कि एक महीने तक निरन्तर एक ही आदमी के यहाँ भिक्षा करता रहे। संन्यासी के लिये तो घर घर से मधुकरी माँगकर उदरपूर्ति करने का विधान है।


भट्टाचार्य ने कहा-
प्रभो! इन सब बातों को रहने दीजिए। आप इस प्रार्थना को स्वीकार करके हमारी तथा हमारे सब परिवार की इच्छापूर्ति कीजिए।


प्रभु ने आश्चर्य सा प्रकट करते हुए कहा, आचार्य ! आप भी जब ऐसे धर्मविरूद्ध काम के लिए मुझे विवश करेंगे, तो फिर मूर्ख भक्तों की तो बात ही अलग रही। एक दो दिन कहें तो भिक्षा कर भी लूँ। अन्त में पाँच दिन की भिक्षा बहुत वाद विवाद के बाद निश्चित हुई। भट्टाचार्य जी प्रभु को एकान्त में ही भोजन कराना चाहते थे। इसीलिए प्रभु के साथी अन्य साधु महात्माओं को दूसरे दूसरे दिनों के लिए निमंत्रित किया।


नियत समय पर महाप्रभु भट्टाचार्य के घर भिक्षा करने के लिए पँहुचे।


भट्टाचार्य के के चन्दनेश्वर नाम का एक लडका और षाठी नाम की एक लडकी थी। षाठी के पति अमोघ भट्टाचार्य सार्वभौम के ही पास रहते थे। वे महाशय बडे ही अश्रद्धालु और नास्तिक प्रकृति के पुरूष थे। इसलिए सार्वभौम ने महाप्रभु की भिक्षा के समय उन्हें किसी काम से बाहर भेज दिया था।


क्रमशः .....

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
Enter comments


 
चैतन्य जीवनामृत
Last Viewed Articles
eBook Collection
सभी किताबे
राधा संग्रह
ग्रन्थ
कृष्ण संग्रह
व्रज संग्रह
व्रत कथाएँ
यात्रा
DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
Copyright © radhakripa.in>, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here.