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पं० गंगादास जी द्वारा महाप्रभु को समझाइश

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पंडित गंगादास जी वैसे तो बड़े भारी नामी विद्वान थे, किंतु उनकी विद्या पुस्तकी ही विद्या थी l भक्ति भाव से एकदम कोरे थे l ईश्वर के प्रति उनका उदासीन भाव था l 'यदि ईश्वर होता है तो हुआ करें हमे उससे क्या काम, समय पर भोजन कर लिया, विद्यार्थीयों को पाठ पढ़ा दिया l बस यही हमारे जीवन का व्यापार है l इसमें ईश्वर की कुछ ज़रूरत ही नहीं l' कुछ-कुछ इसी प्रकार के उनके विचार थे l

महप्रभु के भक्त हो जाने की बात सुनकर वे ठहाका मरकर हँसने लगे और विद्यार्थीयों से कहने लगे, 'हाँ, सुना तो मैंने भी है की निमाई अब भक्त बन आया है l पंडित होकर उस पर ये क्या भूत सवार हो गया है-यह तो अनपढ़ मूर्खों का काम है l ब्राह्मण पंडितों को तो निरंतर शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन में ही लगे रहना चाहिये l खैर, अब तुम अपने-अपने स्थानों को जाओ l कल उसे मेरे पास भेज देना मैं उसे समझा दूँगा l मेरी बात को वह कभी नही टालता है l' इतना सुनकर विद्यार्थी अपने-अपने स्थानों पर चले गये l

अगले दिन प्रभु से विद्यार्थीयों ने कहा, 'आचार्य जी ने आज आपको बुलाया है, आगे आपकी इच्छा, आज जाइये या फ़िर किसी दिन हो आइये l' आचार्य का बुलावा सुनकर प्रभु उसी समय दो-चार विद्यार्थीयों को लेकर उनके स्थान पर पहुँचे l वहाँ जाकर प्रभु ने आचार्य की चरण वंदना की, गंगादास जी ने भी उनका पुत्र की भाँति आलिंगन किया और बैठने के लिये एक आसन की ओर संकेत किया आचार्य की आज्ञा पाकर प्रभु उनके बताये हुए आसन पर बैठ गये l प्रभु के बैठ जाने पर साथ के विद्यार्थी भी पीछे एक ओर हट कर पाठशाला की बिछी हुई चटाईयों पर बैठ गये l


प्रभु के सुखपूर्वक बैठ जाने पर वात्सल्य-प्रेम प्रकट करते हुए आचार्य गंगादास जी ने कहा, -
'निमाई! तुम मेरे प्रिय विद्यार्थी हो, मैं तुम्हें पुत्र की भाँति प्यार करता हूँ l शास्त्रों ने कहा है की अपने प्यारे की अपने मुख पर बड़ाई नही करनी चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से उसकी आयु क्षीण होती है l किंतु यथार्थ बात तो कही ही जाती है l तुमने मेरी पाठशाला के नाम को सार्थक कर बना दिया है, तुम जैसे विद्यार्थी को पढ़ाकर मेरा इतने दिनों का परिश्रम से पढ़ाना सफल हो गया है l तुमने अपने प्रकांड पांडित्य द्वारा मेरे मुख को उज्ज्वल कर दिया l मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हूँ l'


आचार्य के मुख से अपनी इतनी प्रशंसा सुनकर प्रभु लज्जित भाव से नीचे की ओर देखते हुए चुपचाप बैठे रहे, उन्होंने इन बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया।


आचार्य गंगा दास फिर कहने लगे -
योग्य बनने के अनन्तर तुम अध्यापक हुए और तुमने अध्यापन कार्य में भी बहुत ख्याति प्राप्त की। तुम्हारे सभी विद्यार्थी सदा तुम्हारे शील स्वभाव की तथा पढाने की सरल सुन्दर प्रणाली की प्रशंसा करते रहते हैं, वे लोग तुम्हारे सिवा दूसरे किसी के पास पढना पसंद ही नहीं करते। किन्तु कल उन्होंने आकर मुझसे तुम्हारी शिकायत की है। तुम उन्हें अब मनोयोग के साथ ठीक-ठीक नहीं पढाते हो।

और लोगों ने भी मुझसे आकर कहा है कि तुम अनपढ़ मूर्ख भक्तों की भाँति रोते गाते तथा हँसते कूदते हो, एक इतने भारी अध्यापक को ऐसी बातें शोभा नहीं देती। तुम विद्वान हो, समझदार हो, मेधावी हो। शास्त्रज्ञ होकर मूर्खों के कामों की नकल क्यों करने लगे हो ? एेसे ढोंग तो वे ही लोग बनाते हैं जो शास्त्रों की बातें तो जानते नहीं, विद्या बुद्धि से तो हीन हैं, किंतु मूर्खों में अपने को पुजवाना चाहते है वे ही ऐसे ढोंग रचा करते हैं।

तुम्हें इसकी क्या जरूरत है ? तुम तो स्वयं विद्वान हो, बड़े-बड़े लोग तुम्हारी विद्या बुद्धि पर ही मुग्ध होकर मुक्त कण्ठ से तुम्हारी प्रशंसा करते है, फिर तुम ऐसे अशास्त्रीय आचरणों को क्यों करते हो ? ठीक- ठीक बताओ क्या बात है ? ये सब बातें सुनकर भी प्रभु चुप रहे, उन्होंने किसी भी बात का कोई भी उत्तर नहीं दिया।


गंगा दास जी ने अपना व्याख्यान समाप्त नहीं किया। वे फिर कहने लगे तुम्हारे नाना नीलांबर चक्रवर्ती एक नामी पंडित है। तुम्हारे पूज्य पिता भी प्रतिष्ठित पंडित थे, तुम्हारे मातृ कुल तथा पितृ कुल में सनातन सें पांडित्य चला आ रहा है, तुम्हारी विद्या बुद्धि से ही मुग्ध होकर सनातन मिश्र जैसे राजपंडित ने अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे साथ किया है।

नवदीप की विद्वन मण्डली तुम्हारा विशेष सम्मान करती है, विद्यार्थियों को तुम्हारे प्रति पूर्ण सम्मान के भाव हैं, फिर तुम मूर्खों के चक्कर में कैसे आ गये ? देखो बेटा अध्यापक का पद पूर्व जन्म के बड़े भाग्यों से मिलता है। तुम उसके काम में असावधानी करते हो, यह ठीक नहीं है। बोलों उत्तर क्यों नहीं देते ? अब अच्छी तरह से पढाया करोगे ?


नम्रता के साथ प्रभु ने कहा,
आपकी आज्ञा पालन करने की भरसक चेष्टा करूंगा। क्या करूं, मेरा मन मेरे वश में नहीं है। कहना चाहता हूं कुछ और मुँह से निकल जाता है कुछ और ही !


गंगादास जी ने प्रेम के साथ कहा, - सब ठीक हो जाएगा। चित्त को ठीक रखना चाहिए तुम तो समझदार आदमी हो। मन को वश में करो, सोच समझकर बात का उत्तर दो। कल से खूब सावधानी रखना। विद्यार्थियों को खूब मनोयोग के साथ पढ़ाना।

अच्छा ! जो आज्ञा कह कर प्रभु ने आचार्य गंगादास को प्रणाम किया और वे विद्यार्थियों के पास उनसे विदा हुए।

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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