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प्रभु आप अपने चरणों में मुझे स्थान दीजिए

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आगे का पार्ट-337


रघुनाथ जी ने रोते-रोते कहा, - 
प्रभो ! मुझे बच्चों की भाँति बहकाइये नहीं। यह मैं खूब जानता हूँ कि आप सबके मन के भावों को समझकर उसे जैसा अधिकारी समझते हैं, वैसा ही उपदेश करते हैं। बाल बच्चों में अनासक्त रहकर और उन्हीं के साथ रहते हुए भजन करना उसी प्रकार है जिस प्रकार नदी में घुसने पर भी शरीर न भीगे। प्रभो ! ऐसा व्यवहार तो ईश्वर के सिवा साधारण मनुष्य कभी नहीं कर सकता। आप जो उपदेश कर रहे हैं वह उन लोगों के लिए है, जिनकी संसारी विषयों में थोडी बहुत वासना बनी हुई है। मैं आपके चरणों को स्पर्श करके कहता हूं कि मेरी संसारी विषयों में बिल्कुल ही आसक्ति नहीं। मुझे घर का अपार वैभव काटने के लिए दौडता है, अब मैं अधिक काल घर के बंधन में नहीं रह सकता।


प्रभु ने कहा, - तुमने जो कुछ कहा है, वह सब ठीक है, किन्तु यह मर्कट वैराग्य ठीक नहीं। कभी कभी मनुष्यों को क्षणिक वैराग्य होता है, जो विपत्ति पडने पर एकदम नष्ट हो जाता है, इसलिए कुछ दिन घर में रहो, तब देखा जायेगा।


अत्यन्त ही करूण स्वर में रघुनाथ जी ने कहा, प्रभो ! आपके चरणों की शरण में आने पर फिर वैराग्य नष्ट ही कैसे हो सकता है? क्या अमृत का पान करने पर भी पुरूष को जरा मृत्यु का भय हो सकता है? आप अपने चरणों में मुझे स्थान दीजिए।


प्रभु ने धीरे से प्रेम के स्वर में कहा, अच्छी बात है, देखा जायेगा, अब तो तुम घर जाओ, मेरा अभी वृन्दावन जाने का विचार है। यहां से लौटकर पुरी जाऊँगा और वहाँ से बहुत ही शीघ्र वृन्दावन जाना चाहता हूँ।


वृन्दावन से जब लौट आऊँ, तब तुम आकर मुझे पुरी में मिलना। प्रभु के ऐसे आश्वासन से रघुनाथ जी को कुछ संतोष हुआ। वे सात दिनों तक शान्तिपुर में ही प्रभु के चरणों में रहे। वे इन दिनों पलभर के लिए प्रभु से पृथक नहीं होते थे। प्रभु के भिक्षा कर लेने पर उनका उचिष्ट प्रसाद पाते और प्रभु के चरणों के नीचे ही शयन करते। इस प्रकार सात दिनों तक रहकर प्रभु की आज्ञा लेकर वे फिर सप्तग्राम के लिए लौट गये।


श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी की पुण्य तिथि समीप ही थी, इसलिए अद्वैताचार्य के प्रार्थना करने पर प्रभु दस दिनों तक शान्तिपुर में ठहरे रहे। नवद्वीप आदि स्थानों से बहुत से भक्त प्रभु के दर्शनों के लिए आया करते थे। शचीमाता भी अपने पुत्र को फिर से देखने के लिए आ गयीं और सात दिनों तक अपने हाथों से प्रभु को भिक्षा कराती रहीं।

इसी बीच एक दिन महाप्रभु गंगापार करके पंडित गौरीदास जी से मिलने गये। वे गौरांग महाप्रभु के चरणों में बडी श्रद्धा रखते थे। उन्होंने प्रभु से वरदान माँगा कि आप निताई और निमाई दोनों भाई मेरे ही यहाँ रहें। तब प्रभु ने उनके यहां प्रतिमा में रहना स्वीकार किया। उन्होंने निमाई और निताई की प्रतिमा स्थापित की।


जिनमें उनके विश्वास के अनुसार अब भी दोनों भाई विराजमान हैं। ये ही महाप्रभु गौरांगदेव और नित्यानंद जी की आदि मूर्ति बतायी जाती हैं। ये दोनों मूर्ति बडी ही दिव्य हैं।


कालना लौटकर प्रभु फिर शान्तिपुर में आ गये, वहां से आपने सभी भक्तों को विदा कर दिया और आप अपने अन्तरंग दो चार भक्तों को साथ लेकर श्री जगन्नाथ पुरी के लिए चल पडे।


क्रमशः.....

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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