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देवता और ब्रह्मा जी के सामने हमारी उम्र भुनगो के समान है

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आगे का पार्ट-369...


प्रभु ने उत्तेजित भाव से उल्लास के साथ उत्तर दिया। उस समय सनातन को बताते बताते उनका चेहरा चमक रहा था, आँखों से प्रसन्नता की किरणें जोरों से निकल निकल कर सनातन जी के शरीर में प्रवेश कर रहीं थीं।

प्रभु ने कहा, - सनातन .! यह प्राणी जब समझता नहीं, तभी तो माया में फँसकर अपनी क्षुद्र परिधि को ही सब कुछ समझता है। कूप का मेढक समुद्र का क्या अनुमान लगा सकता है?


उसके लिये तो कुएँ से बढकर दूसरा कोई समुद्र ही नहीं। तुम प्रत्यक्ष देखते हो। जिसे तुम अपना एक दिन कहते हो, उसी में लाखों जीव ऐसे हैं जो अनेकों बार मर जाते हैं और अनेकों बार नया जन्म धारण कर लेते हैं। तुम्हारा एक दिन ही हुआ, उनके अनेक जन्म बीत गये। देवता और ब्रह्मा जी के सामने हमारी उम्र तो भुनगों के समान है। इस विषय में सभी पुराणों में बडा ही सुन्दर विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। पुराणों में इसी के समझाने के लिए एक अत्यन्त ही मनोहर कथा आती है।


सत्ययुग में रैवत नाम के एक बडे ही पराक्रमी और सर्वशक्तिमान राजा थे। ब्रह्मा जी के वरदान से वे सभी लोकों में जा आ सकते थे। सतयुग के मनुष्य आजकल से चौगुने लम्बे होते हैं।उनके एक रेवती नाम की कन्या थी, वह साधारण लडकियों की अपेक्षा कुछ अधिक लम्बी थी। बहुत खोजने पर भी महाराज को उसके योग्य कोई वर नहीं मिला। तब उन्होंने सोचा, चलो, ब्रह्मा जी से ही पूछ आवें कि इस लडकी का विवाह किसके साथ करें। दो चार राजकुमार अच्छे तो हैं, उनमें से कौन सा सर्वश्रेष्ठ होगा, इस बात का निर्णय ब्रह्मा जी से ही करा लावें। यह सोचकर वे अपनी लडकी को साथ लेकर ब्रह्मलोक में पँहुचे।


उस समय ब्रह्मा जी अनेक देवता, ऋषि और अन्य लोकों के देवों से घिरे हा हा, हू हू का गान सुन रहे थे। महाराज रैवत भी प्रणाम करके चुपचाप एक ओर बैठ गये। आधी घडी के बाद गायन समाप्त हो गया, तब पितामह ब्रह्मा जी ने हँसते हुए राजा रैवत से पूछा,-  कहो, भाई ! कैसे आना हुआ?


हाथ जोडे हुये दीन भाव से महाराज ने कहा, भगवन् ! आपके श्री चरणों के दर्शनों के निमित्त चला आया। सोचा था इस लडकी के पति के संबंध में आपसे पूछूँगा। आप जिसके लिए आज्ञा करेंगे, उसे ही दे दूँगा।


मुस्कराकर भगवान् ब्रह्मदेव जी ने कहा, - तुम्हीं बताओ, तुम्हें कौन सा राजकुमार बहुत पसन्द है।


कुछ सोचकर महाराज ने कहा, प्रभो ! अमुक राजकुमार मुझे सबसे अधिक अच्छा लगता है, फिर आप जिसके लिये आज्ञा करेंगे उसे ही इसे दे दूंगा। आपकी आज्ञा ही लेने तो आया हूं। 


इतना सुनते ही भगवान् ब्रह्मा जी अपनी सफेद दाढी को हिलाते हुए बडे ही जोरों से हँसने लगे और बोले, राजन्.! जिस राजकुमार का तुम नाम ले रहे हो, वह कुल तो कब का नष्ट हो गया। तुम्हें पता नहीं इस आधी घडी के समय में ही पृथ्वी पर बीसों बार सतयुग, त्रेता और द्वापर बीत गये।


अब तो उन वंशो का नामोनिशान भी नहीं है। तुम्हारी पुरी को अन्य राजाओं ने अपनी राजधानी बना लिया है। अब तो वहां कलियुग आ रहा है। तुम इसी समय जाओ, ब्रज में भगवान् श्रीकृष्णजी के बडे भाई शेष जी के अवतार बलराम जी अवतीर्ण हुये हैं, जाकर इस कन्या को उन्हीं को ही दे दो, वे सब ठीक कर लेंगे। भगवान् ब्रह्मदेव जी की आज्ञा शिरोधार्य करके और उनके चरणों में प्रणाम करके महाराज पृथ्वी पर आये और रेवती जी को श्री बलराम जी को देकर वे पहाड पर तपस्या करने चले गये। इधर बलराम जी ने अपनी पत्नी को बहुत लम्बी देखकर उनके गले में अपना हल डालकर नीचे खींचकर अपने बराबर बना लिया।


सनातन जी ने कहा,
प्रभो .! बडे आश्चर्य की बात है ब्रह्मा जी भी स्थायी नहीं रहते। इस जगत के एकमात्र स्वामी की भी अन्त में यह गति होती है।


प्रभु ने कहा, - जो उत्पन्न हुआ है, उसका अन्त अवश्य होगा, चाहे आज हो या कल।


क्रमशः....

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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