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नदिया में महाप्रभु की भावावस्था

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अब तो इनके अद्भुत नूतन भाव नवद्वीप में स्थान-स्थान पर चर्चा होने लगी l हँसते-हँसते श्रीमान पंडित ने श्रीवास आदि भक्तों से कहा, 'आज हम आप लोगो को बड़ी ही प्रसन्नता की बात सुनाना चाहते हैं, आप लोग सभी सुनकर परम आश्चर्य करेंगे l गया में जाकर निमाई पंडित की काया पलट ही हो गयी l वे श्रीकृष्ण-प्रेम में विह्वल होकर कभी रोते हैं, कभी गाते हैं, कभी हँसते हैं और कभी-कभी ज़ोरों से नृत्य करने लगते हैं l उनके जीवन में महान् परिवर्तन हो गया है l आज तक किसी को स्वप्न में भी ऐसी आशा नहीं थी कि उनका जीवन इस प्रकार एक साथ ही इतना पलट खा जायगा l'

परम प्रसन्नता प्रकट करते हुए श्रीवास पंडित ने कहा,'सचमुच ऐसी बात है ? तब तो फिर वैष्णवो के भाग्य खुल गये l वैष्णवो को एक प्रधान आश्रय हो गया l निमाई पंडित के वैष्णव हो जानें पर भक्ति फिर से सनाथ हो गयी l आप हँसी तो नही कर रहे हैं ? क्या यथार्थ में ऐसी ही बात है ?

ज़ोर देकर श्रीमान पंडित ने कहा, 'मैं शपथपूर्वक कहता हूँ इसमें हँसी का क्या काम ? आप स्वयं जाकर देख आइये, वे तो बालको की भाँति फूट-फूटकर रुदन कर रहें हैं l कल सदाशिव मुरारी आदि सभी लोगों को शुक्लाम्बऱ ब्रह्मचारी के स्थान पर बुलाया है, वहाँ अपनी यात्रा का समस्त वृत्तांत सुनावेंगे l' इस बात को सुनकर श्रीवास आदि सभी भक्तों को परम संतोष हुआ l
किंतु गदाधर पंडित को अब भी कुछ संदेह ही बना रहा l उन्होनें निश्चय किया कि ब्रह्मचारी के घर में छिपकर सब बातें सुनूँगा, देखें उन्हें यथार्थ में कृष्ण प्रेम उत्पन्न हुआ या नहीं l यह सोचकर वे दूसरे दिन नियत समय के पूर्व ही शुकलाम्बर जी के घर में जा छिपे l 


नियत समय पर सदाशिव पंडित, मुरारी गुप्त, नीलाम्बर चक्रवर्ती तथा श्रीमान पंडित आदि सभी मुख्य-मुख्य गण्य-मान्य भद्रपुरुष प्रभु की यात्रा का समाचार सुनने शुकलाम्बर जी के स्थान गंगातीर आ पहुँचे l

थोड़ी देर में प्रभु भी वहाँ आ पहुँचे l आते ही इन्होंने वही राग अलापना आरम्भ कर दिया l कहने लगे, 'भैया! मुझे श्रीकृष्ण से मिला दो, मेरा प्यारा कृष्ण कहाँ चला गया ? हाय रे ! मेरा दुर्भाग्य ! मेरा श्रीकृष्ण मुझसे बिछुड़ गया ! मुझे बिलखता ही छोड़ गया l' इतना कहते-कहते ये मूर्छित होकर गिर पड़े l इनकी ऐसी दशा देखकर भीतर घर में छिपे हुए गदाधर भी प्रेम में विह्वल होकर मूर्छा आने के कारण पृथ्वी पर गिर पड़ें और ज़ोरों से रुदन करने लगे l

कुछ काल के अनंतर प्रभु की मूर्छा भंग हुई l वे कुछ काल के लिये प्रकृतिस्थ हुए, किंतु फिर भारी वेदना उठने के कारण ज़ोरों से चीत्कार मारकर रुदन करने लगे l इनकी ऐसी दशा देखकर वहाँ जितने भी मनुष्य बैठे थे, सभी फूट-फूट कर रोने लगे l सब के रुदन से आकाश गूँजने लगा l क्रंदन की ध्वनि से आकाश मंडल भर गया l बहुत से दर्शनार्थी आ-आकर खड़े हो गये l उनकी आँखों से भी अश्रु बहने लगे l इस प्रकार शुकलाम्बर का घर रुदन के कारण कोलाहल पूर्ण हो गया l 


कुछ कालके अनंतर फिर प्रभु सुस्थिर हुए l उन्हें कुछ-कुछ बाह्मज्ञान होने लगा l स्थिर होने पर प्रभु ने शुकलाम्बर जी से पूछा, 'ब्रह्मचारीजी! घर के भीतर कौन है ?'

प्रेम के साथ ब्रह्मचारी जी ने कहा, 'आपका गदाधर है ।' 'गदाधर' इतना सुनते ही वे फूट-फूटकर रोने लगे l रोते-रोते कहने लगे, 'गदाधर भैया तुम ही धन्य हो l मनुष्य जन्म का यथार्थ फल तो तुमने ही प्राप्त किया है, हम तो वैसे ही रह गये । हमारी आयु तो वैसे ही बर्बाद हुई l' इतना कहकर फ़िर वही 'हा कृष्ण ! हा अशरण शरण ! हा पतितपावन ! कहाँ चले गये l' फिर अधीर होकर लोगों के पैरों पर अपना सिर रख-रखकर कहने लगे, 'भैया ! मुझ दुखिया के उपर दया करो ! मेरे दुख को दूर करो l मुझे श्रीकृष्ण से मिला दो l मेरे प्राण उन्ही से मिलने के लिये तड़प रहे हैं l'

प्रभु के इन दीनता भरे वाक्यों को सुनकर सभी का हृदय फटने सा लगा l सभी प्रेमावेश में आकर रुदन करने लगे l सभी अपनेआप को भूल गये l इस प्रकार रुदन और विलाप करते हुए शाम हो गयी और सभी अपने-अपने घर लौट आए l 

दूसरे दिन स्वस्थ होकर महाप्रभु अपने विद्या-गुरु श्रीगंगादास पंडित के घर गये और उन्हें प्रणाम करके बैठ गये l श्रीगंगादास जी ने इनका आलिंगन किया और यात्रा का सभी वृत्तांत पूछा l और कहने लगे, 'तुमने तो तीन चार महीने लगा दिये l तुम्हारे सभी विद्यार्थी अत्यंत दुखी थे, उन्हें तुम्हारे पाठ के अतिरिक्त किसी पंडित का पाठ अच्छा ही नहीं लगता है l इसीलिए वे लोग तुम्हारी बहुत प्रतीक्षा कर रहे थे l अच्छा हुआ अब तुम आ गये l अब तो पढ़ाओगे न ?'

महाप्रभु ने कहा, 'हाँ प्रयत्न करूँगा, श्रीकृष्ण कृपा करेंगे तो सब कुछ होगा l सब उन्ही के ऊपर निर्भर है l' इस प्रकार उन्हें आश्वसन देकर फिर आप मुकुंद संजय के चंडी मंडप, जहाँ आपकी पाठशाला थी, वहाँ आये l संजय महाशय बड़े ही आनंद के साथ प्रभु से मिले l उनके पुत्र पुरुषोत्तम संजय ने प्रभु के पादपद्मो में श्रद्धाभक्ति के साथ प्रणाम किया l प्रभु ने उसे आलिंगन किया इस प्रकार दोनों पिता-पुत्र प्रभु के दर्शनोंसे परम प्रसन्न हुए l

स्त्रियों ने जब प्रभु के आगमन के समाचार सुने तो वे बड़ी ही आनंदित हुई और परस्पर में भाँति-भाँति की बातें कहने लगी l कोई कहती, 'अब तो निमाई पंडित एकदम बदल आयें l' कोई कहती , 'बड़े भाग्य से भगवत-भक्ति प्राप्त होती है l यह सौभाग्य की बात है कि निमाई जैसे पंडित परम भगवत वैष्णव बन गये l' इस प्रकार सभी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप भाँति-भाँति की बातें कहने लगीं l सब से मिल-जुलकर निमाई घर लौट आये l 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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