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अनन्य भक्तों पर महाप्रभु की कृपा का तो कहना ही क्या

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आगे का पार्ट 414..... 

महाराज ने अपने पुत्र के कहने से सोचा, - हमें तो रूपये मिलने चाहिए। एक बार उसे चाँग पर चढवा दे संभव है इस भय से रूपये दे दे। भवानन्द के पुत्र को हम दो लाख रूपये के लिए चाँग पर थोडे ही चढवा सकते हैं। अभी कह देते हैं इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायेगा। और रूपये भी मिल ही जायेंगे।


बस फिर क्या था.। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को बाँधकर यहां लाया जाये। क्षणभर में गोपीनाथ बाँधकर चाँग पर खडे किये गये। चाँग का मतलब है, एक बडा सा मंच होता है, उस मंच के नीचे भाग में तेज धार वाला एक बहुत बडा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं जिससे उस पर गिरते ही प्राणों का अन्त हो जाये। इसी का नाम चाँग चढाना है। ये बडे बडे अपराधियों के साथ होता है।


गोपीनाथ पट्टनायक चांग पर चढाये जायेंगे, इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे। उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, भांति भांति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरूष महाप्रभु के शरणापन्न हुये और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे।


प्रभु ने कहा,
भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूं? राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिए। जब वह राजद्रव्य को अपने विषय भोग में उडा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रूपये कुछ कम होते ही नहीं। जैसा आपने किया, उसका फल भोगे। मैं क्या करूँ?


भवानन्द जी के सगे संबंधी और स्नेही प्रभु से भाँति भाँति की अनुनय विनय करने लगे।

प्रभु ने कहा, - भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रूपये होते तो देकर उसे छुडा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुडाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।


इतने में ही बहुत से पुरूष प्रभु के समीप और भागते हुये आये। उन्होंने संवाद दिया कि भवानन्द वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।


सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी का बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अन्तरंग भक्त तिलमिला उठे।

स्वरूप दामोदर ने अधीरता के साथ कहा, प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुये भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहे, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।


महाप्रभु ने कुछ प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा, स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो.? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिए राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें। अच्छा, मान लो मैं जाऊं भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रूपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।

स्वरूप गोस्वामी ने कहा, आपसे राजदरबार में जाने के लिए कौन कहता है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही विश्व ब्रह्माण्ड को उलट पलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुख से बचाना तो साधारण सी बात है। आपको बचाना ही पडेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायेगी और वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में तो किसी को सन्देह नहीं।


राजदरबार में हाहाकार मचा हुआ था। सभी के मुखो पर गोपीनाथ के चाँग पर चढने के बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत से प्रतीत होते थे.

क्रमशः .....

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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