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श्री श्रीवास पण्डित जी का आर्विर्भाव महोत्सव

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श्री श्रीवास पण्डित जी आर्विर्भाव महोत्सव (ज्येष्ठ कृष्ण दशमी )पर विशेष 

आश्रयामि श्री श्रीवासं तमाद्यं पण्डितं मुदा।
शुक्लाम्बरधरं गौंर गौरभक्ति-प्रदायकम्।।


अर्थ - शुक्ल-वस्त्र धारण वाले, गौरवर्ण, श्रीगौंराग-भक्ति प्रदान करने वाले प्रधान पण्डित श्री श्रीवास जी की मैं हर्ष-पूर्वक शरण ग्रहण करता हूँ।


श्रीवास जी श्रीहट्ट निवासी वैदिक पण्डित श्रीजलधर के पुत्र हैं। श्रीजलधर श्रीहट्ट से नवद्वीप आकर निवास करने लगे। श्रीवास जी का आविर्भाव श्रीहट्ट में हुआ । श्रीनलिन, श्रीराम, श्रीपति तथा श्रीनिधि (श्रीकान्त) - इनके भाई हैं।


"श्रीवासपण्डितो धीमान् य:पुरा नारदो मुनि:"


श्रीवास पण्डित पूर्वावतार में भक्ति के आचार्य श्रीनारद हैं ,इनमें स्वाभाविक कृष्ण-भक्ति विद्यमान है।


एक दिन श्रीमन् महाप्रभु भागकर श्रीवासजी के घर आये और आवेश में बोले-ओ श्रीवासिया ! क्या कर रहा हैं तू ? उस समय श्रीवासजी श्रीनृसिंह भगवान् के ध्यान में मग्न थे। प्रभु की आवाज सुन इनकी समाधि भंग हो गई। 

प्रभु ने कहा - किसकी पूजा और ध्यान कर रहा है तू? जिसका ध्यान कर रहा हैं, देख उसे अपने सामने ही !

श्रीवास पण्डित ने देखा - श्रीनृसिंह ही वीरासन पर बैठे हैं। शंख,चक्र,गदा,पद्म हाथों में सुशोभित हैं तथा सिंह की तरह गर्जना कर रहे हैं। यह देख श्रीवास तो स्तब्ध हो गए, क्या देख रहा हूँ-कुछ समझ न सके।

श्रीगौंराग ने कहा-अरे श्रीवास ! इतने दिन तक तू मुझे नहीं पहचान पाया, कौन हूँ मैं? तुम्हारे उच्च-संकीर्तन एवं अद्वैत की हुंकार सुनकर मैं बैकुण्ठ छोड़कर तुम्हारे पास आया हूँ। श्रीवास पुलकित हो उठे , प्रेमाश्रु की धारा बह निकली और वे प्रभु की स्तुति करने लगे।

एक बार श्रीवास पण्डित को श्रीमन् महाप्रभु ने कहा ," श्रीवास ! तुम हमेशा कीर्तन करते रहते हो। तुम्हारा घर है, पत्नी है, बच्चा है, वैष्णवों को जिमाते रहते हो। तुम कुछ काम तो करते नहीं तो तुम्हारा घर-बार कैसे चलेगा।*


श्रीवास बोले ,"भगवान ! ऐसा है कि देखो ! जिस दिन ऐसी नौबत आई ,एक दिन खाना न मिला , तो मैं शांत बैठूंगा और हरि नाम करता रहूंगा।


दूसरे दिन भी खाना न मिला तो मैं भगवान् के आगे ताली बजाकर याद दिलाऊंगा कि* *योगक्षेमं वहाम्यहम् ।


फिर भी तीसरे दिन न मिला तो भी इन्तजार करूँगा और जोर से ताली बजाकर उन्हें फिर से याद दिलाऊंगा कि* *योगक्षेमं वहाम्यहम्


फिर भी अगर न मिला तो मैं अपना संकीर्तन, अपना भगवान्, अपना परम् धन ,अपनी पूजा पाठ क्यों छोड़ूँ? मेरे भगवान् को कोई गलत क्यों बोले ? मैं तो गंगा जी में कूद जाऊँगा ,मगर मैं अपने भगवान् को नहीं छोड़ूंगा।


श्रीमन्महाप्रभु यह सुन हंसने लगे।

श्री महाप्रभु ने कहा ,"श्रीवास मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ कि तुम्हारे पास जो कोई भी आएगा वो कभी भूखा नहीं जाएगा।लक्ष्मी जी भगवान् विष्णु को छोड़ सकती है श्रीवास , लेकिन मैं सच कहता हूँ कि लक्ष्मी तुम्हें कभी नहीं छोड़ेंगी।

श्री वास वचनामृत - मनुष्य की शिक्षा किसलिए है ? एक मात्र कृष्ण भक्ति जानने के लिए तो यदि कृष्ण भक्ति प्राप्त न हुई तो विद्या का क्या फल? इसलिए इस मूल्यवान समय को बेकार मत गवाओ, अब चंचलता छोड़कर शीघ्र कृष्ण भजन में लग जाओ  

श्री श्रीवास प्रभु के श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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