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ब्रज - परिचय

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सत्य, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत जो पराब्रह्म है, वही व्यापक है. इसीलिए उसे ही ब्रज कहते हैं. यह सच्चिदानन्द स्वरूप परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है. वेदों में भी ब्रज शब्द का प्रयोग हुआ है, "व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रज:" अर्थात् गौचारण की स्थली ही ब्रज कहलाती है,

 

हरिवंश पुराणानुसार मथुरा के आस-पास की स्थली को ब्रज की संज्ञा दी गयी है.अष्टछाप के कवियों ने ब्रज शब्द को गोचारण, गोपालन तथा गौ और ग्वालों के विहार स्थल के रूप में वर्णित किया है. 

 

ब्रज का हर वृक्ष देव हैं, हर लता देवांगना है, यहाँ की बोली में माधुर्य है, बातों में लालित्य है, पुराणों का सा उपदेश है, यहाँ की गति ही नृत्य है, रति को भी यह स्थान त्याग करने में क्षति है, कण-कण में राधा-कृष्ण की छवि है, दिशाओं में भगवद नाम की झलक, प्रतिपल कानों में राधे-राधे की झलक, देवलोक-गोलोक भी इसके समक्ष नतमस्तक हैं.

 

सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल का प्रत्येक रज-कण,  वृक्ष, पर्वत, पावन  कुण्ड-सरोवर और श्री यमुनाजी श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य निकुंज लीलाओं के साक्षी हैं। श्री कृष्ण जी ने अपने ब्रह्मत्व का त्याग कर सभी ग्वाल बालों और ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं. 

"धन्य वृन्दावन धाम है, धन्य  वृन्दावन नाम। धन्य वृन्दावन रसिक जो सुमिरै श्यामा श्याम "

 

वृन्दावन का नाम आते ही मन पुलकित हो उठता है. योगेश्वर श्री कृष्ण की मनभावन मूर्ति आँखों के सामने आ जाती है. उनकी दिव्य आलौकिक लीलाओं की कल्पना से ही मन भक्ति और श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है. वृन्दावन को ब्रज का हृदय कहते है जहाँ श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाएँ की हैं.  इस पावन भूमि को पृथ्वी का अति उत्तम तथा परम गुप्त भाग कहा गया है.

 

“वृन्दावन धाम को वास भलो जहाँ पास बहे यमुना जल पानी,

 जो जन नहाये के ध्यान करे, वैकुंठ मिले तिनको राजधानी

     वेद पुराण बखान करे और संतमुनि गुणी मनमानी

       यमुना यमदूत टारत है, भव तारक है श्री राधिका रानी ”

 

पद्म पुराण में इसे भगवान का साक्षात शरीर, पूर्ण ब्रह्म से सम्पर्क का स्थान तथा सुख का आश्रय बताया गया है इसी कारण से यह अनादि काल से भक्तों की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है. चैतन्य महाप्रभु, स्वामी हरिदास, श्री हितहरिवंश, महाप्रभु वल्लभाचार्य आदि अनेक गोस्वामी भक्तों ने इसके वैभव को सजाने और संसार को अनश्वर सम्पति के रुप में प्रस्तुत करने में जीवन लगाया है. यहाँ आनन्दप्रद युगलकिशोर श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा की अद्भुत नित्य विहार लीला होती रहती है.

 

श्री वृंदावन धाम श्री राधाकृष्ण की क्रीडा स्थली है जो आज भी रसिको का प्राण व उनका प्रमुख आकर्षण केन्द्र है श्री राधाकृष्ण सम्बन्धी पर्वो पर तो इस आलौकिक तीर्थो पर इतनी भीड़ हो जाती है कि प्रमुख मार्गो पर श्रीकृष्ण भक्तो का ताँता ही लगा रहता है, समस्त दिशा मदुरातिमधुर “राधे ” नाम के दिव्य उच्चारण से गुंजायमान रहती है.

यह वह नगरी है जहाँ के मोर कोयल, तोते, आदि पक्षी भी राधा नाम का गुण गान करते है. श्री राधाकृष्णा के प्रेमी संतो का तो यह गुण है. हजारों साधू भगवन्नाम लेते हुए श्री राधा रानी के सहारे कही भी सोकर, कुछ भी प्रसाद रूप में पाकर, यमुना का जलपान करके, आनंद से रहते है.  

 "वृन्दावन सुन्दर महा, सब सुखमां की खान, रतन जटित मंदिर जहाँ शोभित जीवन प्राण 

वृन्दावन छबि कहा कहूँ यमुना जल चहुँ ओर, पद्मलता अरूबेली द्रुम छाजत हैं हर ठौर 
शोभित लता सुहावनी कदम वृक्ष जहाँ, ताहिं पुष्प वाटिका सघन बन त्रिभुवन पटतर नाहिं 
वृन्दावन के वास हित सुर तरसत निशि भोर कदम कुञ्ज छाया तरे राजत युगल किशोर 
वृन्दावन छबि वरनते हारे सहस्त्र मुख शेष, पावें दर्शन रूप धरि "सखी", अजेन्द्र महेश 
उ़दर भरूँ टुक माँग के जग नाते छुट जाएँ सखी, वास ब्रिज मिलै पर बिन भागन को पायें 
वंशी वट यमुना निकट सुन्दर धीर समीर, विहरत जहाँ नित युगल वर गोरी श्याम 

 शरीर घाट बाट कुञ्ज गलिन की छबि को सके बखान, भोरें ही मग रोक के ठाढे चतुर सुजान" 


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
Comments
2019-05-22 11:38:00 By Hardev singh Nimotiya

इन आर्टिकल हेतु बहुत बहुत धन्यवाद।

2011-07-28 04:17:18 By aakashnema

pls sir muje radha ji ka oe biraj ka puravaran pls mail kar de ge

2011-07-12 03:57:09 By Devendra Singh Chauhan

jai jai shree vrindavandham

2011-06-22 19:05:28 By Prateek Sharma

radheradhe................

2011-06-22 19:05:27 By Prateek Sharma

radheradhe................

2011-06-22 19:05:25 By Prateek Sharma

radheradhe................

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